Mauganj News; मऊगंज के इस गांव में पानी बना रिश्तों की परीक्षा, पतियों को छोड़ मायके जाने को मजबूर हुई महिलाएं

Mauganj News today: मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले के हनुमना विकासखंड अंतर्गत ग्राम कोढ़वा में इन दिनों पानी का संकट सिर्फ प्यास तक सीमित नहीं रहा। अब यह समस्या परिवारों और रिश्तों पर भी असर डालने लगी है। गांव की महिलाएं पानी की कमी से इतनी परेशान हो चुकी हैं कि उन्होंने कुछ महीनों के लिए ससुराल छोड़ मायके जाने का फैसला लेना शुरू कर दिया है।
गांव की यह स्थिति सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक है। यहां करीब दो किलोमीटर के दायरे में केवल एक नल ऐसा है, जहां से लोगों को पीने का पानी मिलता है। सुबह चार बजे से ही महिलाओं की लंबी कतार लग जाती है। कई बार घंटों इंतजार करने के बाद भी सिर्फ एक बाल्टी पानी मिल पाता है। पहाड़ी इलाका होने की वजह से जलस्त्रोत न के बराबर है।
डेढ़ किलोमीटर दूर स्कूल के नल से भरना पड़ता है पानी
ग्राम कोढ़वा की महिलाएं हर दिन डब्बा, बाल्टी और बर्तन लेकर करीब एक से डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित शासकीय माध्यमिक विद्यालय गदाखुर पहुंचती हैं। स्कूल परिसर में लगे नल से ही आसपास के कई घरों का गुजारा चल रहा है।
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स्थिति इतनी गंभीर है कि कई बार पानी भरने को लेकर बहस और विवाद तक की नौबत आ जाती है। गर्मी बढ़ने के साथ जलस्तर और नीचे चला गया है, जिससे नल से बहुत धीमी धार निकलती है।

नल के पास एक तालाब भी मौजूद है, लेकिन उसका पानी पीने योग्य नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि तालाब का पानी गंदा और असुरक्षित है, इसलिए मजबूरी में लोग घंटों लाइन में लगकर नल का इंतजार करते हैं।
“अब मायके चले जाएंगे, यहां पानी के बिना गुजारा नहीं”
गांव की महिलाओं का कहना है कि घर संभालना, बच्चों की देखभाल करना और ऊपर से रोज पानी के लिए संघर्ष करना अब उनकी सहनशक्ति से बाहर हो चुका है।
एक महिला ने कहा
“सुबह से पानी के लिए भागते रहो। खाना बनाना, बच्चों को देखना, पशुओं को पानी देना… पूरा दिन इसी में निकल जाता है। अगर यही हाल रहा तो कुछ महीनों के लिए मायके चले जाएंगे।”
दूसरी महिला बताती है कि पुरुष सुबह काम पर निकल जाते हैं और दिनभर बाहर रहते हैं। पीछे घर की सारी जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। ऐसे में पानी की कमी सबसे बड़ा संकट बन चुकी है।
महिलाओं का कहना है कि गर्मी के चार महीने उनके लिए किसी सजा से कम नहीं होते। कई बार दिनभर मेहनत के बाद भी जरूरत भर पानी नहीं मिल पाता।
पतियों ने भी मानी मजबूरी
जब महिलाओं के पतियों से पूछा गया कि उनकी पत्नियां मायके जाने की बात कर रही हैं, तो उन्होंने भी बेबसी जाहिर की।
एक ग्रामीण ने कहा
“अब क्या करें? समस्या तो है ही। हम दिनभर मजदूरी या काम में लगे रहते हैं। कई लोगों ने बोर कराने की कोशिश की, लेकिन जमीन में पानी ही नहीं निकला।”
पुरुषों का कहना है कि आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि रोज टैंकर मंगाया जा सके। कई परिवार मजदूरी पर निर्भर हैं और रोज कमाने-खाने की स्थिति में जीवन गुजर रहा है।
वर्षों पुरानी समस्या, लेकिन समाधान नहीं
ग्रामीणों के अनुसार यह संकट नया नहीं है। गांव कई वर्षों से पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। हर गर्मी में हालात और बदतर हो जाते हैं।
लोगों का आरोप है कि पंचायत स्तर पर समस्या उठाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि जब भी सरपंच से पानी की व्यवस्था को लेकर बात की जाती है, तो अक्सर बात टाल दी जाती है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहां कुएं और छोटे जलस्रोत लोगों की जरूरत पूरी कर देते थे, लेकिन धीरे-धीरे जलस्तर नीचे चला गया। अब ज्यादातर स्रोत सूख चुके हैं।
बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं की सेहत पर असर
पानी की इस समस्या का असर सिर्फ घरेलू जीवन तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
सुबह जल्दी उठकर पानी भरने जाने के कारण कई बच्चे समय पर स्कूल नहीं पहुंच पाते। वहीं महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, जिससे थकान और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ रही हैं।
कई महिलाओं ने बताया कि सिर पर भारी बर्तन उठाकर रोज लंबी दूरी तय करने से कमर और गर्दन में दर्द रहने लगा है। लेकिन मजबूरी ऐसी है कि आराम करने का विकल्प भी नहीं।
“पानी के लिए जिंदगी रुक गई है”
गांव की एक बुजुर्ग महिला ने कहा
“पहले गांव में इतना संकट नहीं था। अब हर साल पानी कम होता जा रहा है। दिन का आधा समय सिर्फ पानी के इंतजार में निकल जाता है।”
ग्रामीणों का कहना है कि पानी की समस्या ने गांव की सामान्य जिंदगी को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। लोग खेती-किसानी और रोजगार से ज्यादा पानी की चिंता में लगे रहते हैं।
पलायन की आशंका बढ़ी
अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले दिनों में गांव से पलायन बढ़ सकता है। महिलाओं का मायके जाने का फैसला केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस गहरे संकट की चेतावनी है जिसमें गांव धीरे-धीरे फंसता जा रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी सिर्फ प्राकृतिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी बनती जा रही है। जब पानी के कारण परिवार टूटने जैसी स्थिति बनने लगे, तो यह प्रशासन और व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर संकेत है।
जल संकट और सरकारी दावों के बीच सवाल
एक तरफ सरकार हर घर जल और ग्रामीण पेयजल योजनाओं के बड़े दावे करती है, दूसरी तरफ कोढ़वा जैसे गांव आज भी बुनियादी पानी की व्यवस्था के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गांव की महिलाएं पूछती हैं कि आखिर योजनाएं कागज से जमीन तक कब पहुंचेंगी? क्या हर गर्मी में उन्हें इसी तरह पानी के लिए लाइन में खड़ा रहना पड़ेगा?
उम्मीद अब भी बाकी
कठिन हालात के बावजूद ग्रामीणों को उम्मीद है कि अगर प्रशासन गंभीरता से ध्यान दे, तो इस समस्या का समाधान निकल सकता है। गांव में स्थायी जलस्रोत, टंकी या पाइपलाइन व्यवस्था होने से हजारों लोगों को राहत मिल सकती है।
फिलहाल, मऊगंज के कोढ़वा गांव में हर सुबह पानी के लिए लगने वाली लाइन यह याद दिलाती है कि विकास की असली तस्वीर गांवों की जमीन पर ही दिखाई देती है। यहां लोग सिर्फ पानी नहीं भर रहे… बल्कि अपनी जिंदगी को किसी तरह बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
