30 साल से गड्ढे का पानी पीने को मजबूर परिवार: 80 साल की बुजुर्ग रोज 1 KM दूर से लाती है पानी, इकलौता बेटा डूबा; 25 पशु पाल 2 बेटियों की कराई शादी

मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले से करीब 45 किलोमीटर दूर, हनुमना जनपद की ग्राम पंचायत हाटा के जिलकी गांव में एक ऐसा छोटा सा टोला मौजूद है, जहां जिंदगी आज भी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रही है। यहां रहने वाले कुछ परिवार पिछले लगभग 30 वर्षों से नदी किनारे बने एक गड्ढे के पानी पर निर्भर हैं। भीषण गर्मी हो, बरसात हो या कड़ाके की ठंड हर दिन करीब एक किलोमीटर का सफर तय कर यही पानी घर तक लाना उनकी मजबूरी है। ना बिजली है..ना कोई पहुंच मार्ग

यह कहानी सिर्फ पानी की कमी की नहीं, बल्कि उस दर्द की भी है जिसमें एक परिवार ने अपना इकलौता बेटा खो दिया, फिर भी इंसानियत और जीवों के प्रति दया नहीं छोड़ी।
“हम गरीब हैं, लेकिन जानवरों को मरने नहीं छोड़ सकते”
जिलकी गांव के बीहड़ इलाके में रहने वाले राधेश्याम यादव बेरोजगार हैं। उनके परिवार में पत्नी, चार बेटियां और बुजुर्ग माता-पिता हैं। इसी साल बरसात के दौरान उनका इकलौता बेटा पानी से भरे गड्ढे में डूब गया। बेटे की मौत के बाद घर का सहारा टूट गया, लेकिन राधेश्याम की जिंदगी अभी भी संघर्षों के बीच आगे बढ़ रही है।
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राधेश्याम बताते हैं कि उन्होंने करीब 25 गाय, भैंस और बकरियां पाल रखी हैं। वजह पूछने पर उनकी आंखें भर आती हैं। वह कहते हैं

“कई गायें आवारा घूमती थीं। इस बीहड़ इलाके में अगर उन्हें नहीं रखते तो दाना-पानी के बिना मर जातीं। हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन इन्हें भूखा नहीं छोड़ सकते।”
खुद पीने के लिए पानी नहीं, लेकिन पशुओं को बचाने की जिम्मेदारी उठाने वाला यह परिवार आज भी इंसानियत की मिसाल बना हुआ है।
एक किलोमीटर दूर गड्ढे से भरकर लाना पड़ता है पानी
टोले में न तो नलजल योजना पहुंची और न ही मीठे पानी की कोई स्थायी व्यवस्था है। परिवार हर दिन नदी किनारे बने एक गड्ढे से पानी भरकर लाता है। गर्मियों में जब जलस्तर नीचे चला जाता है, तब यह परेशानी और बढ़ जाती है।
80 वर्षीय बुजुर्ग महिला, जिन्हें ठीक से सुनाई भी नहीं देता, वह भी सिर पर बर्तन रखकर पानी लाने को मजबूर हैं। उम्र के इस पड़ाव में जहां उन्हें आराम की जरूरत है, वहां जिंदगी ने उन्हें पानी के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया।
राधेश्याम के पिता छठीलाल यादव बताते हैं

जब से यहां रह रहे हैं, तब से यही पानी पी रहे हैं। कई बार सोचते हैं पानी लेने जाएं या नहीं, क्योंकि बहुत दूर है। लेकिन बिना पानी के गुजारा भी नहीं।”
“एक-दो घरों के लिए व्यवस्था नहीं बनेगी”
परिवार का आरोप है कि उन्होंने पंचायत से कई बार पानी की समस्या बताई, लेकिन समाधान नहीं मिला। राधेश्याम का कहना है कि जब सरपंच से पानी की व्यवस्था की मांग की गई, तब जवाब मिला
“एक-दो घरों के लिए अलग से व्यवस्था नहीं बनेगी।”
यह जवाब सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उन लोगों की बेबसी भी दिखाता है जो आबादी से दूर अपने पुश्तैनी जमीन पर रह रहे हैं।
दरअसल, इस इलाके में पहले कई परिवार रहते थे, लेकिन पानी की समस्या इतनी बढ़ गई कि लोग धीरे-धीरे गांव की घनी आबादी की ओर पलायन कर गए। अब यहां केवल दो से तीन घर बचे हैं, जिनकी कुल आबादी करीब 10 से 12 लोगों की है।
अधूरा आवास, अधूरी जिंदगी
सरकार की आवास योजना के तहत परिवार को मकान तो मिला, लेकिन राधेश्याम आरोप लगाते हैं कि निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया गया। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार की वजह से पूरा घर तैयार नहीं हो पाया।
दीवारें अधूरी हैं, सुविधाएं नहीं हैं, और गर्मियों में घर भट्ठी की तरह तपता है। लेकिन इसके बावजूद परिवार वहीं रहने को मजबूर है क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं।
बेटे की मौत का दर्द आज भी ताजा
राधेश्याम की पत्नी रविता यादव जब अपने बेटे का जिक्र करती हैं तो उनकी आवाज भर्रा जाती है। वह बताती हैं कि कुछ महीने पहले ही उनके बेटे की गड्ढे में डूबने से मौत हो गई थी।

“हमारी चार बेटियां हैं। एक बेटा था… वो भी चला गया। अब वंश खत्म हो गया।”
रविता बताती हैं कि हाल ही में उन्होंने अपनी दो बेटियों की एक साथ शादी की। उस दौरान पानी की भारी समस्या थी। हालांकि पंचायत की तरफ से टैंकर भेजा गया था, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में पानी का संकट अब भी जस का तस बना हुआ है।
विकास के दावों के बीच प्यासा टोला
देश और प्रदेश में हर घर जल पहुंचाने के दावे किए जाते हैं। गांवों में नलजल योजना और जल जीवन मिशन के बड़े-बड़े बोर्ड लगाए जाते हैं। लेकिन जिलकी गांव का यह टोला उन दावों से कोसों दूर नजर आता है।
यहां न पाइपलाइन है, न हैंडपंप, न टंकी और न ही बिजली की पर्याप्त व्यवस्था। मोबाइल नेटवर्क तक कई बार काम नहीं करता। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर विकास की योजनाएं इन आखिरी छोर पर बसे लोगों तक कब पहुंचेंगी?
पलायन की बड़ी वजह बना पानी
गांव के लोगों का कहना है कि यहां पानी की समस्या वर्षों से बनी हुई है। यही वजह है कि कई परिवार अपनी जमीन और मकान छोड़कर दूसरे इलाके में बस गए। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनके पास दूसरी जगह जाने का विकल्प नहीं, वही यहां रह रहे हैं।
बीहड़ इलाके में बसे इन घरों तक सड़क और बुनियादी सुविधाएं भी ठीक से नहीं पहुंच पाई हैं। बरसात में हालात और खराब हो जाते हैं। कई बार लोग दिनों तक गांव से कट जाते हैं।
इंसानियत और संघर्ष की जीवित तस्वीर
राधेश्याम का परिवार सिर्फ गरीबी की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की तस्वीर है, जहां लोग तमाम मुश्किलों के बावजूद जीवन को थामे हुए हैं। बेटे को खोने का दुख, पानी के लिए रोजाना संघर्ष, अधूरा मकान, बेरोजगारी और भविष्य की चिंता इन सबके बीच भी यह परिवार पशुओं को बचाने और बेटियों को सम्मान से विदा करने की कोशिश कर रहा है।
आज जब शहरों में लोग पानी की एक बोतल खरीदकर पी लेते हैं, तब जिलकी गांव का यह परिवार एक गड्ढे के भरोसे जिंदगी जी रहा है।
प्रशासन से उम्मीद
ग्रामीणों का कहना है कि अगर यहां एक हैंडपंप, बोर या पाइपलाइन की व्यवस्था हो जाए तो उनकी सबसे बड़ी समस्या खत्म हो सकती है। पानी के कारण लोगों का पलायन रुक सकता है और बचे हुए परिवार भी सम्मान से जीवन जी सकेंगे।
अब देखना यह होगा कि यह कहानी प्रशासन तक पहुंचने के बाद क्या इस टोले की प्यास बुझ पाती है या फिर आने वाले वर्षों में भी लोग इसी तरह गड्ढे का पानी पीने को मजबूर रहेंगे।
