“IAS गुरु डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का स्टूडेंट बना ‘दिव्य बाबा’: डिप्टी कलेक्टर का बेटा, MBA डिग्री के बाद पर्चा दरबार—चौंकाने वाले दावे”
मऊगंज जिले में इन दिनों एक अनोखा “दिव्य दरबार” चर्चा का केंद्र बना हुआ है। जिले के शाहपुर क्षेत्र में लक्ष्मी नारायण महाराज नाम के एक युवक अपने घर पर शनिवार से मंगलवार तक लोगों के लिए दरबार लगा रहे हैं। खास बात यह है कि उनके दरबार की कार्यशैली काफी हद तक बाबा बागेश्वर धाम की तरह बताई जा रही है, जहां बिना कुछ बताए लोगों की समस्याओं को समझने और उनका “पर्चा” बनाने का दावा किया जाता है। इस पूरे मामले ने स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि आसपास के इलाकों में भी लोगों की जिज्ञासा और बहस को जन्म दे दिया है।
सबसे पहले अगर इस दरबार की कार्यप्रणाली को समझें, तो बताया जाता है कि यहां आने वाले लोग अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचते हैं। लक्ष्मी नारायण महाराज कथित रूप से बिना पूछे ही लोगों के बारे में जानकारी बता देते हैं और फिर उनके लिए एक “पर्चा” तैयार करते हैं। इस पर्चे में व्यक्ति की समस्या और उसके समाधान से जुड़ी बातें लिखी जाती हैं। दरबार में आने वाले कई लोगों का कहना है कि उन्हें इससे राहत भी मिली है, जिसके चलते लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

दरबार की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां आने वाले लोग खुद अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। कुछ लोग दावा करते हैं कि उनकी निजी समस्याओं, बीमारियों या पारिवारिक परेशानियों के बारे में बिना बताए ही महाराज ने सही जानकारी दी। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन आस्था के स्तर पर लोग इसे सच मान रहे हैं और बड़ी संख्या में दरबार में पहुंच रहे हैं।
सनातन धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिक
इस पूरे आयोजन को “विज्ञान धर्म सरकार” के नाम से संचालित किया जा रहा है। यह नाम अपने आप में लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसमें “विज्ञान” और “धर्म” दोनों शब्दों का समावेश है। लक्ष्मी नारायण महाराज का कहना है कि सनातन धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिक है और वे उसी आधार पर लोगों की समस्याओं को समझते हैं। उनका यह भी मानना है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में विज्ञान छिपा हुआ है, जिसे सही तरीके से समझने की जरूरत है।
डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का स्टूडेंट बना बाबा
लक्ष्मी नारायण महाराज की पृष्ठभूमि भी इस पूरे मामले को और दिलचस्प बनाती है। जानकारी के अनुसार, वे काफी पढ़े-लिखे हैं और उनके पास एमबीए, एमए और बीबीए जैसी डिग्रियां हैं। इतना ही नहीं, वे देश के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर विकास दिव्यकीर्ति के संस्थान दृष्टि आईएएस-आईपीएस कोचिंग में भी पढ़ाई कर चुके हैं और वर्ष 2014 में वहां छात्र रहे हैं। उनके पिता भी डिप्टी कलेक्टर के पद पर रह चुके हैं, जिससे उनका परिवार प्रशासनिक और शिक्षित पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जाता है।

योग्यता के बावजूद भी बाबा ने क्यों चुना मार्ग
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इतनी अच्छी शिक्षा और करियर विकल्प होने के बावजूद उन्होंने बाबा बनने का रास्ता क्यों चुना। इस पर लक्ष्मी नारायण महाराज का कहना है कि उनका झुकाव बचपन से ही अध्यात्म और विज्ञान की ओर रहा है। वे मानते हैं कि उनका उद्देश्य लोगों की सेवा करना है और उन्हें मानसिक व आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाना है। उनका दावा है कि वे किसी अंधविश्वास को नहीं बढ़ावा दे रहे, बल्कि विज्ञान और धर्म के संतुलन के साथ लोगों की मदद कर रहे हैं।
दरबार निर्माण के लिए लिया जाता है दान
हालांकि, इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दरबार में आने वाले लोगों से 500 रुपये लिए जा रहे हैं। इसे दान के रूप में बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि यह राशि दरबार के निर्माण और व्यवस्था में लगाई जाती है। लेकिन इस बात को लेकर भी लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह पूरी तरह से स्वैच्छिक दान है या फिर एक तय शुल्क के रूप में लिया जा रहा है। कुछ लोग इसे उचित मानते हैं, तो कुछ इसे व्यावसायिक गतिविधि के रूप में देख रहे हैं।
प्रशासन की नजर में दरबार
स्थानीय प्रशासन की नजर भी अब इस पूरे मामले पर बनी हुई है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों का एक जगह इकट्ठा होना और इस तरह के दावे करना संवेदनशील विषय बन सकता है। खासकर तब, जब इसमें लोगों की आस्था, स्वास्थ्य और आर्थिक पहलू जुड़े हों। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में सावधानी बरतना जरूरी है और लोगों को किसी भी दावे पर आंख मूंदकर भरोसा करने से बचना चाहिए।
लोगो का क्या कहना है
दूसरी तरफ, समाज के एक वर्ग का यह भी कहना है कि अगर लोगों को मानसिक शांति और विश्वास मिल रहा है, तो इसे पूरी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता। भारतीय समाज में आस्था का एक गहरा स्थान रहा है और लोग अक्सर अपनी समस्याओं का समाधान धार्मिक या आध्यात्मिक माध्यमों में खोजते हैं। ऐसे में इस तरह के दरबारों की लोकप्रियता को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, मऊगंज के शाहपुर में लग रहा यह “दिव्य दरबार” एक ऐसा विषय बन चुका है, जिसमें आस्था, विज्ञान, शिक्षा और सामाजिक सोच एक साथ जुड़ गए हैं। लक्ष्मी नारायण महाराज की शिक्षा और पृष्ठभूमि इस कहानी को और जटिल बनाती है, वहीं लोगों के अनुभव इसे और रहस्यमय बनाते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दरबार किस दिशा में आगे बढ़ता है और समाज व प्रशासन इसे किस नजर से देखते हैं।
