Rewa collector; जब VIP कल्चर छोड़, नॉन-एसी बस में 42 अधिकारियों को लेकर गांव पहुंच गए रीवा कलेक्टर!भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में अक्सर यह देखा जाता है कि जब कोई बड़ा अधिकारी किसी क्षेत्र के दौरे पर निकलता है, तो गाड़ियों का एक लंबा-चौड़ा काफिला उनके साथ चलता है। हूटर बजाती गाड़ियां, सुरक्षाकर्मियों का घेरा और वीआईपी कल्चर का वो तामझाम, जिससे आम जनता खुद को प्रशासन से दूर महसूस करने लगती है। लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने इस पुरानी और रुढ़िवादी प्रशासनिक छवि को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। रीवा के कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा आज पूरे प्रदेश में हो रही है।
हाल ही में रीवा कलेक्टर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ। इस वीडियो में कोई वीआईपी ठाट-बाट नहीं, बल्कि एक अनोखी सादगी देखने को मिली। कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी अपनी पूरी प्रशासनिक टीम के साथ जिला मुख्यालय से एक साधारण, नॉन-एसी बस में सवार होकर सीधे टिकुरी गांव पहुंच गए। उनके साथ बस में कोई एक या दो अधिकारी नहीं, बल्कि अलग-अलग विभागों के कुल 42 जिला स्तरीय अधिकारी मौजूद थे।
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इस सफर की शुरुआत भी बेहद दिलचस्प रही। बस में सवार होने से पहले कलेक्टर खुद बस के दरवाजे पर खड़े हो गए और एक-एक करके सभी विभागों के अधिकारियों की उपस्थिति की जांच करने लगे। वीडियो में उन्हें साफ तौर पर यह पूछते हुए सुना जा सकता है कि स्वास्थ्य विभाग से कौन आया है, पीडब्ल्यूडी से कौन है और उद्योग विभाग से कौन मौजूद है। जब उन्हें तसल्ली हो गई कि जनता से जुड़े सभी महत्वपूर्ण विभागों के जिम्मेदार अफसर बस में बैठ चुके हैं, तब वे खुद भी उसी साधारण बस में सवार हुए और टिकुरी गांव के लिए रवाना हो गए।
इस अनोखे कदम के पीछे की वजह बेहद गंभीर और सराहनीय है। दरअसल, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए बार-बार जिला मुख्यालय के चक्कर काटने पड़ते हैं। कभी राशन कार्ड की समस्या, कभी पेंशन की रुकावट, तो कभी बिजली, पानी और सड़क से जुड़ी शिकायतें। कई बार ग्रामीण जब एक दफ्तर जाते हैं, तो उन्हें दूसरे विभाग का रास्ता दिखा दिया जाता है। इस चक्कर में उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है। कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने इसी समस्या का जड़ से खात्मा करने के लिए यह योजना बनाई।
जब पूरी की पूरी प्रशासनिक टोली एक साथ बस से टिकुरी गांव पहुंची, तो वहां पहले से ही सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ मौजूद थी। कलेक्टर का यह अंदाज देखकर ग्रामीण हैरान भी थे और खुश भी। गांव में ही एक चौपाल सजाई गई, जहां सभी 42 विभागों के अधिकारी एक साथ बैठे। ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं सीधे संबंधित विभाग के अधिकारी के सामने रखीं। चूंकि मौके पर खुद कलेक्टर और विभाग के मुखिया मौजूद थे, इसलिए शिकायतों का निराकरण तुरंत और पूरी पारदर्शिता के साथ किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम से समाज और प्रशासनिक व्यवस्था को कई बड़े संदेश मिलते हैं। पहला संदेश यह है कि यदि नियत साफ हो, तो वीआईपी कल्चर और फिजूलखर्ची को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है। 42 अधिकारी अगर अपनी अलग-अलग सरकारी गाड़ियों से जाते, तो न सिर्फ ईंधन की भारी बर्बादी होती, बल्कि गांव की पतली सड़कों पर जाम लग जाता। एक ही बस में सफर करने से सरकारी संसाधनों की बचत हुई। दूसरा बड़ा फायदा यह हुआ कि बस के सफर के दौरान सभी विभागों के अधिकारियों के बीच आपसी समन्वय बेहतर हुआ, जिससे विभागों के बीच की दूरियां कम हुईं।
रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के इस सराहनीय प्रयास ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में असली मालिक जनता है और प्रशासन का काम जनता के द्वार तक पहुंचकर उनकी सेवा करना है। वातानुकूलित कमरों और बड़ी-बड़ी गाड़ियों से बाहर निकलकर जब कोई अधिकारी सीधे जमीन पर उतरता है, तो जनता का प्रशासन पर भरोसा कई गुना बढ़ जाता है। टिकुरी गांव का यह दौरा आज देश के अन्य जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक बेहतरीन सीख और प्रेरणा बन चुका है।
