Mp news: मँनगवा सोशल मीडिया की ‘रंगीन’ जन-सुनवाई बनाम दिव्यांग कैलाश की बेरंग जिंदगी
Mp news:लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को ‘जनसेवक’ कहा जाता है। जनता उन्हें इस उम्मीद के साथ चुनती है कि वे उनके दुख-दर्द में सहभागी बनेंगे। वर्तमान डिजिटल युग में इन जनसेवकों की सक्रियता का पैमाना अब सोशल मीडिया बन गया है। फेसबुक पर लाइव जन-सुनवाई, व्हाट्सएप पर शिकायतों के निराकरण के स्टेटस और ट्विटर (X) पर विकास की चमकती तस्वीरें। लेकिन क्या यह चमक उन लोगों तक पहुँच पा रही है, जो आज भी कतार के अंतिम छोर पर खड़े हैं?
हाल ही में कलेक्ट्रेट कार्यालय की सीढ़ियों पर अपनी खराब हो चुकी ट्राई साइकिल के साथ पहुंचे कैलाश की कहानी इस चमक-धमक के पीछे छिपे अंधेरे को उजागर करती है। यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसकी जिंदगी झोलाछाप डॉक्टरों की भेंट चढ़ गई और जिसका वर्तमान प्रशासनिक और राजनैतिक उपेक्षा की चक्की में पिस रहा है।
कैलाश की त्रासदी आज की नहीं है, इसकी जड़ें उनके बचपन में छिपी हैं। एक साधारण सा बुखार, जो दवा से ठीक हो सकता था, वह कैलाश के लिए अभिशाप बन गया। उनके पिता ने गांव के ही एक झोलाछाप डॉक्टर पर भरोसा किया, जो अक्सर ग्रामीण अंचलों में ‘मसीहा’ बनकर घूमते हैं। उस डॉक्टर के एक गलत इंजेक्शन और लापरवाही भरी दवा ने कैलाश के शरीर को जीवन भर के लिए अक्षम बना दिया।
कैलाश बताते हैं कि उस दिन के बाद से उनके पैरों ने साथ देना छोड़ दिया। वह अपाहिज तो हुए ही, साथ ही उनकी पूरी दुनिया सीमित होकर रह गई। एक ऐसा व्यक्ति जो दौड़-भाग कर अपना भविष्य बना सकता था, वह बैसाखी और पहियों के सहारे अपनी जिंदगी की गाड़ी खींचने को मजबूर हो गया।
कुछ साल पहले रेड क्रॉस सोसाइटी की मदद से कैलाश को एक शारीरिक श्रम से चलने वाली ट्राई साइकिल मिली थी। यह साइकिल उनके लिए सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि उनकी आजादी का प्रतीक थी। इसी के सहारे वे अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा कर पाते थे। लेकिन वक्त की मार और रखरखाव के अभाव में अब वह साइकिल जर्जर हो चुकी है।
कैलाश की शारीरिक स्थिति अब ऐसी नहीं है कि वे अपने हाथों के बल पर उस पुरानी साइकिल को खींच सकें। उन्हें अब एक ‘बैटरी वाली ट्राई साइकिल’ की सख्त जरूरत है, ताकि वे बिना किसी की मदद के शहर के रास्तों पर चल सकें। लेकिन एक अदद बैटरी वाली साइकिल पाना कैलाश के लिए माउंट एवरेस्ट चढ़ने जैसा कठिन काम हो गया है।
जब अपनी समस्या लेकर कैलाश स्थानीय विधायक के पास पहुंचे, तो उन्हें लगा था कि शायद जनप्रतिनिधि की एक सिफारिश उनकी जिंदगी आसान कर देगी। कैलाश का कहना है कि उन्होंने विधायक से मिलने की दर्जनों बार कोशिश की। वे कई बार उनके बंगले की चौखट तक पहुंचे, अपनी गुहार लेकर तपती धूप में घंटों इंतजार किया, लेकिन हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला— “विधायक जी अभी क्षेत्र के दौरे पर है
विडंबना देखिए, जिस समय कैलाश विधायक के बंगले के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते थे, संभवतः उसी समय विधायक जी का सोशल मीडिया हैंडल किसी ‘जन-सुनवाई’ की फोटो अपलोड कर रहा होता था। कैलाश का यह दर्द आज के दौर के उन हजारों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जो व्यवस्था के सोशल मीडिया प्रेम और जमीनी बेरुखी के बीच फंसे हुए हैं।
विधायक और राजनेताओं के चक्कर काटकर जब कैलाश पूरी तरह थक गए, तो उन्होंने अंतिम उम्मीद के रूप में कलेक्ट्रेट की राह पकड़ी। मंगलवार को जब वे कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के पास अपनी अर्जी लेकर पहुंचे, तो उनकी आंखों में बेबसी और उम्मीद का मिला-जुला भाव था।
कैलाश ने मीडिया के समक्ष अपना दर्द साझा करते हुए कहा, साहब, मुझे किसी से कोई ऐतराज नहीं है, बस मुझे चलने के लिए एक सहारा चाहिए। विधायक जी मिलते नहीं और पुरानी साइकिल चलती नहीं। अब कलेक्टर साहब ही मेरी आखिरी उम्मीद हैं।” कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कैलाश को उचित कार्रवाई और जल्द से जल्द सहायता प्रदान करने का आश्वासन दिया है।
कैलाश का मामला सिर्फ एक दिव्यांग की व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की कई खामियों को उजागर करता है:
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टर सक्रिय हैं, जो लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं। क्या प्रशासन इन पर लगाम कसने में पूरी तरह विफल रहा है?
जनप्रतिनिधियों का ध्यान डिजिटल इमेज बनाने पर ज्यादा है या वास्तव में लोगों की समस्याओं को सुनने पर?
सरकारी फाइलों में दिव्यांगों के लिए ढेरों योजनाएं हैं, तो फिर कैलाश जैसे पात्र व्यक्ति को एक ट्राई साइकिल के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर क्यों लगाने पड़ रहे हैं?
लोकतंत्र में जनता का विश्वास तब मजबूत होता है जब उसे यह महसूस हो कि उसकी आवाज सुनी जा रही है। कैलाश जैसे लोगों को विज्ञापन या सोशल मीडिया पोस्ट की जरूरत नहीं है, उन्हें जरूरत है एक संवेदनशील नेतृत्व की जो उनकी बैसाखी बन सके।
अब देखना यह है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस खबर के बाद भी अपनी ‘डिजिटल दुनिया’ में मग्न रहते हैं या कैलाश की जर्जर ट्राई साइकिल को बदलकर उसे एक नई रफ्तार देते हैं। समाज और सरकार को यह समझना होगा कि विकास की सार्थकता तभी है जब वह समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुँच सके।
