Mauganj news; सिस्टम की बेरुखी: 10 महीने से नहीं मिला जीवन भत्ता, हाथ में कटोरा लेकर भीख मांगने को मजबूर हुआ निलंबित उपयंत्री

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रीवा/मऊगंज: कहते हैं कि न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। लेकिन जब व्यवस्था किसी कर्मचारी को जिंदा रहने के हक (जीवन निर्वहन भत्ता) से भी महरूम कर दे, तो वह व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा बन जाती है। कुछ ऐसा ही हैरान कर देने वाला नजारा आज रीवा के सिरमौर चौराहे और संयुक्त संचालक कार्यालय के सामने देखने को मिला, जहाँ नगर परिषद मऊगंज के तत्कालीन उपयंत्री (सब-इंजीनियर) राजेश सिंह हाथ में कटोरा लेकर भीख मांगने को मजबूर हो गए।

निलंबन के 10 महीने बाद भी फूटी कौड़ी न मिलने से नाराज और भुखमरी की कगार पर पहुंचे उपयंत्री ने अधिकारियों की कुंभकर्णी नींद तोड़ने के लिए यह अनोखा और गांधीवादी विरोध प्रदर्शन किया।

हरित प्रवाह के साथ अपडेट रहें

जानते है क्या है पूरा मामला

दरअसल, 28 मार्च 2025 को मऊगंज में पाइपलाइन के ऊपर ही नाली निर्माण कराने के मामले में लापरवाही का आरोप लगाते हुए उपयंत्री राजेश सिंह को निलंबित कर दिया गया था। नियमतः निलंबन की अवधि में कर्मचारी को अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए ‘जीवन निर्वहन भत्ता’  दिया जाता है। लेकिन राजेश सिंह का आरोप है कि पिछले 10 महीनों से उन्हें एक रुपया भी नहीं दिया गया है, जिससे उनका परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया है।

अधिकारियों को कई आवेदन दिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। थक-हारकर मैंने तीन बार सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज कराई। लेकिन सिस्टम का तानाशाही रवैया देखिए… बिना मुझसे संपर्क किए, बिना कोई सूचना दिए, उन शिकायतों को ऊंचे स्तर से ‘फोर्स क्लोज’ (जबरन बंद) कर दिया गया।”

राजेश सिंह, निलंबित उपयंत्री
मुझे बलि का बकरा बनाया गया, असली दोषी कोई और”
इस पूरे मामले में एक बड़ा ट्विस्ट देते हुए निलंबित उपयंत्री राजेश सिंह ने विभाग के बड़े अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जिस नाली निर्माण के लिए उन्हें सजा दी जा रही है, वह कार्य उन्होंने कराया ही नहीं था। वह कार्य हनुमना नगर परिषद के उपयंत्री द्वारा कराया गया था।

राजेश सिंह का सीधा आरोप है कि

संयुक्त संचालक कार्यालय द्वारा जानबूझकर शासन को गलत और भ्रामक जानकारी भेजी गई। हनुमना के उपयंत्री को कार्रवाई से बचाने के लिए उन्हें (राजेश सिंह को) बलि का बकरा बनाया गया।
‘भीख’ देखकर जागी विभाग की नींद, अब भोपाल भेजने की तैयारी
जब उपयंत्री हाथ में कटोरा लेकर सड़कों पर उतरे और यह मामला मीडिया की सुर्खियों में आया, तब जाकर विभाग के आला अधिकारियों की नींद टूटी। मामले पर लीपापोती और सफाई देते हुए संयुक्त संचालक हिमांशु भट्ट ने कहा कि इस विषय में भोपाल स्थित वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा की गई है।
इस पूरे मामले का एक विस्तृत प्रतिवेदन (रिपोर्ट) तैयार कर भोपाल मुख्यालय भेजा जा रहा है। जल्द ही वहां से दिशा-निर्देश प्राप्त होते ही उपयंत्री की समस्या और जीवन भत्ते का निराकरण कर दिया जाएगा।”

बड़ा सवाल: ज़िम्मेदार कौन

इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे ने एक बार फिर प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं:
10 महीने की देरी क्यों?यदि उपयंत्री दोषी भी थे, तो कानूनन उनका जीवन भत्ता रोकने का हक किसी अधिकारी को नहीं है। इतने महीनों तक फाइलें क्यों दबाकर रखी गईं?
सीएम हेल्पलाइन का मखौल क्यों?आम जनता और कर्मचारियों की सुनवाई के लिए बनी सीएम हेल्पलाइन शिकायतों को बिना जांचे ‘फोर्स क्लोज’ कैसे कर दिया गया? क्या निचले स्तर पर सांठगांठ चल रही है?

सड़क पर कटोरा थामे एक इंजीनियर की यह तस्वीर मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्टाचार, तानाशाही और लापरवाही की एक ऐसी कहानी बयां कर रही है, जिसका जवाब देने से फिलहाल हर बड़ा अधिकारी बच रहा है। अब देखना यह है कि भोपाल रिपोर्ट भेजने के बाद इस पीड़ित उपयंत्री को उसका हक कब तक मिल पाता है।

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