रीवा संभाग

रीवा का वह दर्दनाक हादसा जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था, 45 घंटे का संघर्ष सीएम को लेना पड़ा था एक्शन

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मप्र के रीवा जिले के त्योथर जनपद का एक छोटा सा गांव मनिका। साल 2024 की एक साधारण-सी दोपहर, जो कुछ ही घंटों में एक ऐसे हादसे में बदल गई, जिसे आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। 6 साल का मासूम मयंक खेलते-खेलते एक खुले 160 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया और फिर शुरू हुई जिंदगी और मौत के बीच लंबी जंग।

दोपहर करीब 3:30 बजे के बीच मयंक घर के पास खेल रहा था। किसी को अंदाजा नहीं था कि पास में मौजूद एक खुला बोरवेल (गड्ढा) उसकी जिंदगी छीन लेगा। अचानक वह फिसला और सीधे गहराई में जा गिरा। परिजनों और ग्रामीणों ने दौड़कर उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन बोरवेल की गहराई और अंधेरा सब पर भारी था।

गांव वालों ने शुरू की पहली जंग

घटना के तुरंत बाद गांव वालों ने अपने स्तर पर रेस्क्यू शुरू किया। रस्सियां डाली गईं, आवाज देकर संपर्क करने की कोशिश हुई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। कुछ ही देर में पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंच गया और बड़े स्तर पर बचाव अभियान शुरू किया गया।

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एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की एंट्री, उम्मीदों की किरण जगी

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) की टीमों को बुलाया गया। पूरे इलाके में सिर्फ एक ही उम्मीद थी मयंक को जिंदा बाहर निकाला जाए।

8 जेसीबी मशीनें और रेस्क्यू की मुश्किल राह

रेस्क्यू टीम ने बोरवेल के समानांतर खुदाई शुरू की। 8 JCB मशीनों से तेजी से गड्ढा खोदा गया। लेकिन 60 फीट के बाद पानी निकल आया, जिससे काम रोकना पड़ा। पानी निकालने के बाद ड्रिल मशीन से सुरंग बनाई गई। सख्त मिट्टी और पत्थरों के कारण कई जगह मैन्युअल खुदाई करनी पड़ी।

45 घंटे की जंग, लेकिन अंत दुखद

लगातार 45 घंटे तक चले ऑपरेशन के बाद टीम मयंक तक पहुंची। वह करीब 42 फीट की गहराई पर मिट्टी और पत्थरों में दबा मिला। कोई हलचल नहीं थी। तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

परिवार की आंखों के सामने टूटी जिंदगी

मयंक के माता-पिता और परिजन पूरे समय मौके पर बैठे रहे। हर पल उम्मीद करते रहे कि उनका बच्चा सुरक्षित लौट आएगा, लेकिन अंत ने सब कुछ छीन लिया। गांव में सन्नाटा और शोक छा गया।

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सीएम की मॉनिटरिंग और सख्त कार्रवाई

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन की निगरानी की। उन्होंने घटना पर गहरा दुख जताया और परिवार को 4 लाख रुपए की सहायता देने की घोषणा की। साथ ही लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों को निलंबित करने के निर्देश दिए।

एक हादसा, जिसने सिस्टम को झकझोर दिया

मयंक की मौत ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी थी—खुले बोरवेल कितने खतरनाक हो सकते हैं।

हादसे के बाद बदली तस्वीर: प्रशासन ने कसा शिकंजा

इस दर्दनाक हादसे के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया और उच्च स्तर पर कई बड़े कदम उठाए। जिले भर में खुले बोरवेल की पहचान कर उन्हें तुरंत बंद कराने का अभियान चलाया गया ग्राम स्तर पर निगरानी बढ़ाई गई। संबंधित विभागों को सख्त निर्देश जारी किए गए। लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई सुनिश्चित की गई। इन प्रयासों का असर साफ तौर पर देखने को मिला।

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दो साल में बड़ा बदलाव: ऐसी घटनाओं पर लगा ब्रेक

सबसे अहम बात यह रही कि इस घटना के बाद से लेकर अब तक इस तरह के बोरवेल हादसों में काफी कमी आई है। रीवा और आसपास के क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं लगभग थम सी गई हैं। यह प्रशासन की सक्रियता और सख्ती का नतीजा माना जा रहा है लोगों में भी जागरूकता बढ़ी है और अब खुले बोरवेल को लेकर पहले से ज्यादा सतर्कता बरती जा रही है।

आज भी जिंदा है मयंक की याद

दो साल बाद भी मनिका गांव में जब इस घटना का जिक्र होता है, तो लोग भावुक हो जाते हैं। मयंक की याद आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

सीख जो हमेशा याद रखनी होगी

मयंक की कहानी एक बड़ी सीख देती है लापरवाही की कीमत बहुत भारी हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि इस हादसे के बाद प्रशासन और समाज दोनों ने मिलकर हालात बदलने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे। ताकि भविष्य में कोई और मासूम ऐसी दर्दनाक मौत का शिकार न बने।

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