Rewa news: रीवा। मध्य प्रदेश सरकार हर मंगलवार को जनसुनवाई आयोजित कर आम जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण का दावा करती है। लेकिन रीवा जिले से सामने आया एक मामला यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या जनसुनवाई केवल प्रशासनिक ‘खानापूर्ति’ बनकर रह गई है? सिरमौर तहसील का बेलवा बड़गैयाँ गांव आज जिला प्रशासन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, जहां कलेक्टर का आदेश होने के बावजूद 50 लोगों का परिवार अपने ही घर का रास्ता पाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।

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सिरमौर तहसील के ग्राम बेलवा बड़गैयाँ निवासी विजय शंकर द्विवेदी और उनके परिवार का मुख्य मार्ग से जोड़ने वाला 100 मीटर का रास्ता छीन लिया गया है। यह रास्ता कोई नया या कच्चा मार्ग नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड और पुराने बंटवारे के अभिलेखों में साफ तौर पर दर्ज है।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि गांव के ही दबंगों—शिवशंकर त्रिपाठी, कैलाश त्रिपाठी, सरोज त्रिपाठी, अमिता त्रिपाठी और राजू त्रिपाठी ने इस दर्ज सार्वजनिक रास्ते पर अवैध कब्जा कर लिया है।
कब्जे के बाद बदतर हुए हालात: न बिजली, न पानी, न रास्ता
रास्ते पर कब्जे के कारण पीड़ित परिवार का मुख्य सड़क से संपर्क पूरी तरह कट गया है। हालत यह है की घर से बाहर निकलने तक का रास्ता नहीं बचा है। रास्ते के अभाव में घर तक न बिजली की लाइन ठीक से पहुंच पा रही है और न ही पीने के पानी की उचित व्यवस्था हो पा रही है। इस दबंगई से केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि लगभग 50 सदस्यों का पूरा परिवार पिछले कई महीनों से प्रताड़ित हो रहा है।
राजस्व विभाग पर भ्रष्टाचार का बड़ा आरोप: हर जांच में बदली पटवारी रिपोर्ट
पीड़ित परिवार का सबसे संगीन आरोप सिरमौर तहसील के राजस्व अधिकारियों और कर्मचारियों पर है। विजय शंकर द्विवेदी ने गंभीर आरोप लगाया कि इस मामले में गठित पटवारी जांच रिपोर्ट को बार-बार बदला गया। पहली रिपोर्ट में स्थिति कुछ और थी, दूसरी में बदल दी गई और तीसरी बार में तो पूरी जांच ही पलट दी गई।आरोप है कि नायब तहसीलदार सिरमौर ने सांठ-गांठ कर पीड़ित को एक ऐसे ‘वैकल्पिक रास्ते’ की तरफ धकेल दिया जो तालाब और बांध से होकर गुजरता है। पीड़ित पक्ष का स्पष्ट कहना है कि भौगोलिक रूप से यह वैकल्पिक रास्ता पूरी तरह असंभव और खतरनाक है, जबकि उनका कानूनी हक राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज पुराने रास्ते पर ही है।

कलेक्टर का आदेश ठंडे बस्ते में
आखिर प्रशासन किसके दबाव में
पीड़ित परिवार ने एसडीएम कार्यालय सिरमौर, कलेक्ट्रेट रीवा और स्थानीय पुलिस चौकी के अनगिनत चक्कर काटे हैं। सूत्रों के मुताबिक, कलेक्टर न्यायालय द्वारा रास्ता खाली कराने और मार्ग खोलने का विचार व आदेश भी जारी किया जा चुका है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कलेक्टर के आदेश के बाद भी ज़मीन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई क्या सिरमौर तहसील का निचला अमला जिले के कलेक्टर के आदेशों को ठेंगा दिखा रहा है?
क्या रीवा का जिला प्रशासन दबंगों के सामने असहाय हो चुका है या फिर जनसुनवाई का मकसद केवल शिकायतें सुनना है, उनका समाधान करना नहीं ।
अमर मिश्रा ‘हरित प्रवाह’ समाचार पत्र के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें डिजिटल मीडिया और समाचार संपादन का लंबा अनुभव है।
