Rewa News: सैटेलाइट ने खोला रीवा का राज: 153 मामलों पर कलेक्टर का ताबड़तोड़ एक्शन
Rewa News: रीवा जिले में फसल अवशेष (नरवाई) जलाने की बढ़ती घटनाओं को लेकर प्रशासन अब सख्त रुख अपनाता नजर आ रहा है। कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी ने जिले के पांच वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारियों (एसएडीओ) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई नरवाई जलाने की घटनाओं की रोकथाम में लापरवाही बरतने और समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करने के आरोप में की गई है। कलेक्टर ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि तीन दिन के भीतर संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
क्या है पूरा मामला
जिले में हाल ही में नरवाई जलाने की घटनाओं में तेजी आई है। प्रशासन द्वारा सैटेलाइट मॉनिटरिंग के माध्यम से इन घटनाओं पर नजर रखी जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिले में कुल 153 स्थानों पर नरवाई जलाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। यह आंकड़ा न केवल पर्यावरण के लिहाज से चिंताजनक है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
सरकार द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं कि नरवाई जलाने की प्रत्येक घटना पर 48 घंटे के भीतर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इसके बावजूद कई मामलों में समय सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं की गई, जिसे गंभीर लापरवाही माना गया है।
किन अधिकारियों को मिला नोटिस
कलेक्टर द्वारा जिन अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, उनमें गंगेव के शिवशरण सरल, जवा के केके कोल, सिरमौर तथा रीवा के बीपी सिंह, त्योंथर के टीआर त्रिपाठी और रायपुर कर्चुलियान के रामजी पाण्डेय शामिल हैं। इन सभी अधिकारियों पर अपने-अपने क्षेत्र में नरवाई जलाने की घटनाओं को रोकने में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाने का आरोप है।
सैटेलाइट से निगरानी, फिर भी लापरवाही
प्रशासन द्वारा आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए सैटेलाइट के जरिए खेतों में लगने वाली आग की घटनाओं की निगरानी की जा रही है। इससे घटनाओं की सटीक लोकेशन और समय की जानकारी तुरंत उपलब्ध हो जाती है। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा समय पर मौके पर पहुंचकर कार्रवाई नहीं करना प्रशासन की नजर में गंभीर चूक है।
कलेक्टर सूर्यवंशी ने स्पष्ट किया कि तकनीक के इस युग में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। जब हर घटना की जानकारी तुरंत मिल रही है, तो कार्रवाई में देरी या अनदेखी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर खतरा
नरवाई जलाना केवल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर पड़ता है। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, खेतों की उर्वरता भी प्रभावित होती है क्योंकि आग से मिट्टी में मौजूद लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार नरवाई जलाने से भूमि की उत्पादकता पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। इसके अलावा, आसपास के क्षेत्रों में धुएं का असर स्कूलों, अस्पतालों और आम जनजीवन पर भी पड़ता है।
प्रशासन की चेतावनी
कलेक्टर ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नरवाई जलाने की घटनाओं को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सभी कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय निगरानी रखें और किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ नियमों का सख्ती से पालन कराएं।
उन्होंने यह भी कहा कि जिन क्षेत्रों में बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, वहां विशेष अभियान चलाकर किसानों को वैकल्पिक उपायों की जानकारी दी जाए। साथ ही, नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जुर्माना और अन्य दंडात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।
किसानों के लिए क्या हैं विकल्प
नरवाई जलाने के बजाय किसानों के लिए कई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं, जैसे कि हैप्पी सीडर, सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) जैसी मशीनों का उपयोग। इन तकनीकों के जरिए फसल अवशेष को खेत में ही मिलाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
सरकार द्वारा इन मशीनों पर सब्सिडी भी दी जाती है, ताकि किसान आसानी से इन्हें अपना सकें। इसके बावजूद जागरूकता की कमी और लागत के कारण कई किसान अभी भी पारंपरिक तरीके यानी आग लगाने का सहारा लेते हैं।
आगे क्या होगा
अब सभी की नजर इस बात पर है कि नोटिस मिलने के बाद संबंधित अधिकारी क्या जवाब देते हैं। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
प्रशासन की इस सख्ती को जिले में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। साथ ही, यह संदेश भी स्पष्ट है कि जिम्मेदारी निभाने में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
रीवा जिले में नरवाई जलाने की घटनाओं को लेकर प्रशासन की सख्ती यह दर्शाती है कि अब पर्यावरणीय मुद्दों पर समझौता नहीं किया जाएगा। सैटेलाइट निगरानी, समयबद्ध कार्रवाई और जवाबदेही तय करने जैसे कदम यह सुनिश्चित करने की दिशा में उठाए गए हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण हो सके।
यदि अधिकारी और किसान दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाएं, तो न केवल पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है, बल्कि कृषि क्षेत्र को भी अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है।
