Rewa news: रीवा जिला पंचायत की बैठक में हंगामा पुष्पेंद्र गौतम के मुद्दे पर तीखी बहस
Rewa news: रीवा जिला पंचायत की सामान्य सभा की बैठकें अमूमन विकास कार्यों के दावों, बजट के आवंटन और फाइलों के निस्तारण तक सीमित रहती हैं। लेकिन बीते दिनों हुई बैठक ने एक अलग ही रूप ले लिया। जहाँ एक तरफ सदन की कार्यसूची में नारी सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास जैसे आदर्श शब्द लिखे थे, वहीं दूसरी ओर सदन के भीतर का वास्तविक दृश्य इन शब्दों के बिल्कुल विपरीत दिखाई दिया। जिला पंचायत सदस्य पद्मेश गौतम द्वारा उठाए गए एक मुद्दे ने न केवल सदन की शांति भंग की, बल्कि प्रशासनिक नैतिकता और सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के व्यवहार पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
बैठक की शुरुआत सामान्य तरीके से हुई थी। एजेंडा स्पष्ट था—कैसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाया जाए। लेकिन चर्चा के बीच में ही जिला पंचायत सदस्य पद्मेश गौतम ने देवतालाब विधायक गिरीश गौतम के पीए पुष्पेंद्र गौतम से जुड़े एक प्रकरण का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक सचिव द्वारा महिला अधिकारी (एपीओ) के साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया गया। जैसे ही यह मामला सदन के पटल पर आया, सदन का सौहार्दपूर्ण वातावरण अचानक तीखी बहस और व्यक्तिगत आरोपों-प्रत्यारोपों में बदल गया। यह केवल दो पक्षों के बीच की बहस नहीं थी, बल्कि यह उस व्यवस्था पर प्रहार था जहाँ प्रशासनिक पदों पर बैठे लोग कथित तौर पर सत्ता के प्रभाव में आकर मर्यादा भूल जाते हैं।
पद्मेश गौतम ने अपने संबोधन में अत्यंत गंभीर सवाल उठाए। उनका तर्क सीधा था कि जब सरकार बड़े-बड़े मंचों से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला आरक्षण का समर्थन करती है, तब उन्हीं के विभाग के भीतर एक महिला अधिकारी सुरक्षित या सम्मानित महसूस क्यों नहीं कर रही? सदन में इस मुद्दे पर हुई तीखी नोकझोंक के दौरान विपक्ष ने इसे प्रशासनिक अराजकता बताया। आरोप यह है कि विधायक के पीए के नाम का उपयोग कर विभागीय अधिकारी दबाव बनाने या अभद्रता करने का प्रयास करते हैं। यदि जमीनी स्तर पर काम कर रही महिला अधिकारी के साथ इस तरह की घटनाएं होती हैं, तो यह न केवल उस महिला का अपमान है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की विफलता है जो उसे सुरक्षा देने का वादा करती है।
पद्मेश गौतम ने पुरजोर शब्दों में कहा कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या प्रशासन में इतनी पारदर्शिता और हिम्मत है कि वह सत्ता पक्ष से जुड़े व्यक्ति के विरुद्ध लगे आरोपों की सही तरीके से जांच कर सके? बैठक में मौजूद अन्य जनप्रतिनिधियों के बीच भी इस मुद्दे पर दो फाड़ दिखे। सत्ता पक्ष की ओर से जहाँ इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताने की कोशिश की गई, वहीं दूसरी ओर जिला पंचायत के कुछ सदस्यों ने इसे महिला अस्मिता से जोड़कर देखा। चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि महिला आरक्षण केवल कागजों तक सीमित नहीं होना चाहिए। अगर किसी महिला को पद पर बैठने के बाद भी अभद्रता का सामना करना पड़ता है, तो आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
यह घटना केवल एक बार की बहस नहीं है, बल्कि रीवा के प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है। यह सवाल खड़ा होता है कि क्या विधायक के पीए या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम पर विभाग में मनमानी चल रही है? सचिव और महिला अधिकारी के बीच का यह विवाद अब केवल विभागीय जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे कार्यस्थल पर एक ऐसा वातावरण सुनिश्चित करें जहाँ हर कर्मचारी, विशेषकर महिला कर्मचारी, बिना किसी भय और दबाव के काम कर सके। यदि विभागीय सचिव या अन्य कर्मचारी किसी बाहरी दबाव या रसूख के कारण अपने सहकर्मियों के साथ अमर्यादित व्यवहार करते हैं, तो इससे पूरी कार्यप्रणाली दूषित होती है।
रीवा जिला पंचायत की इस बैठक ने आईना दिखाने का काम किया है। एक तरफ हम आधुनिक भारत और डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जिला मुख्यालयों की बैठकों में आज भी महिला सम्मान के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है। पुष्पेंद्र गौतम का मुद्दा तो एक उदाहरण मात्र है, लेकिन असली समस्या वह मानसिकता है जो पद और सत्ता के नशे में मर्यादा को भूल जाती है।
यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होती और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही नहीं की जाती, तो भविष्य में कोई भी महिला अधिकारी इस तरह के पदों पर काम करने से कतराएगी।
अब गेंद जिला प्रशासन और राज्य सरकार के पाले में है। क्या वे केवल भाषणों तक सीमित रहेंगे, या वास्तव में कार्यस्थल पर महिला सम्मान को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे? पद्मेश गौतम द्वारा उठाए गए इन सवालों का जवाब मिलना केवल सदन की शांति के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि रीवा की जनता और उन हजारों महिला कर्मचारियों के भरोसे के लिए भी आवश्यक है जो व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लगाए बैठी हैं।
