Mp news: मौसम, मनुष्य और जीवन का संतुलन : संघर्ष, संवेदना और साधना का आध्यात्मिक चिंतन
Mp news: शहडोल। मौसम कभी पक्षपात नहीं करता। वह न किसी के पक्ष में खड़ा होता है, न विपक्ष में। वह अपने स्वभाव के साथ आता है—कभी शीतल बयार बनकर, कभी तपती धूप बनकर, कभी रिमझिम फुहारों में जीवन का संगीत घोलता है, तो कभी आंधी-तूफान बनकर मनुष्य के धैर्य की परीक्षा लेता है। प्रकृति का यही धर्म है—निष्पक्ष, निस्पृह और निरंतर। परंतु मनुष्य की दृष्टि, उसकी परिस्थितियाँ और उसके अनुभव मौसम को अलग-अलग अर्थ दे देते हैं। एक ही वर्षा किसी के लिए उत्सव बन जाती है, किसी के लिए विनाश का कारण। एक ही धूप कहीं अन्न पकाती है, तो कहीं जीवन झुलसा देती है।यही जीवन का सत्य भी है। परिस्थितियाँ सभी के जीवन में आती हैं, लेकिन उनका प्रभाव व्यक्ति की दृष्टि, धैर्य और कर्म पर निर्भर करता है।
मौसम कभी पक्षपात नहीं करता, वह बस आता है अपने स्वभाव के साथ। फर्क इतना है कि किसी के आँगन में वह सुकून बनकर गिरता है, तो किसी के जीवन में परीक्षा बनकर बरस जाता है। यह केवल काव्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। आज जब युवा पीढ़ी त्वरित सफलता, भौतिक आकर्षण और प्रतिस्पर्धा के दबाव में उलझती जा रही है, तब ऐसे चिंतन समाज को यह संदेश देते हैं कि जीवन केवल सुख का नाम नहीं, संघर्ष का सौंदर्य भी है।
प्रकृति निष्पक्ष है, दृष्टि भिन्न है
जब बादल बरसते हैं तो वे यह नहीं चुनते कि किसके घर बरसना है और किसके खेत पर नहीं। बारिश सब पर समान रूप से गिरती है। परन्तु परिणाम अलग-अलग होते हैं। किसी के लिए वही बारिश खिड़की पर बैठकर चाय की चुस्कियों में कविता बन जाती है, तो किसी किसान के लिए वही बारिश समय से पहले फसल चौपट कर चिंता का कारण बन जाती है। यह भिन्नता प्रकृति में नहीं, परिस्थितियों में है। इसी तरह जीवन की घटनाएँ भी स्वयं सुख-दुख नहीं होतीं, हमारी चेतना उन्हें अर्थ देती है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं।
समत्वं योग उच्यते
अर्थात परिस्थितियों में समभाव ही योग है। यदि मनुष्य मौसम की तरह निष्पक्षता और धैर्य सीख ले, तो जीवन के उतार-चढ़ाव उसे विचलित नहीं करेंगे। आज का युवा अक्सर छोटी असफलता को जीवन की समाप्ति मान लेता है। परीक्षा में अपेक्षित अंक न मिलना, नौकरी में देरी, संबंधों में टूटन—इन सबको वह अंत समझ बैठता है। जबकि प्रकृति सिखाती है कि हर पतझड़ के बाद बसंत आता है। हर सूखी धरती पर वर्षा लौटती है। जीवन में ठहराव स्थायी नहीं होता।
संघर्ष जीवन का अभिशाप नहीं, निर्माण की प्रक्रिया है
जब बूंद तपती जमीन पर गिरती है तो केवल मिट्टी ही नहीं महकती, मन भी प्रफुल्लित होता है। पर वही बूंद किसान के खेत में असमय बरसे तो उसकी मेहनत डूब सकती है। तब प्रश्न उठता है-क्या संघर्ष केवल पीड़ा है? नहीं, संघर्ष ही मनुष्य को तपाकर कुंदन बनाता है। बीज यदि मिट्टी के भीतर अंधकार और दबाव न सहे, तो अंकुर नहीं बनता। सोना यदि अग्नि में न तपे, तो आभूषण नहीं बनता। मनुष्य भी कठिनाइयों से गुजरकर ही परिपक्व होता है।
इस संबंध में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। यह वाक्य केवल प्रेरणा नहीं, संघर्ष का दर्शन है। संघर्ष से भागना जीवन से भागना है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि सफलता सीढिय़ों से नहीं, संघर्षों से बनती है। आज समाज में बहुत-से युवा त्वरित उपलब्धियों की संस्कृति में धैर्य खो रहे हैं। वे बीज बोते ही फल चाहते हैं। जबकि प्रकृति सिखाती है—हर फल का अपना समय होता है। आम के वृक्ष को बरगद की गति से नहीं मापा जा सकता। हर व्यक्ति की यात्रा अलग है।
क्षणों को जीना सीखिए
जो पल आपको खुशी दे, उसे जी भर के जियोज्” यह वाक्य केवल आनंद लेने की बात नहीं करता, यह वर्तमान में जीने का संदेश देता है। आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि मनुष्य वर्तमान में नहीं जीता। वह या तो बीते दुखों में उलझा रहता है या भविष्य की आशंकाओं में। जबकि जीवन वर्तमान का नाम है। जो क्षण अभी हमारे पास है, वही वास्तविक है। बारिश की एक बूँद हथेली पर गिरकर जितना सुख देती है, उतना कई बार बड़े वैभव भी नहीं दे पाते। हम छोटे-छोटे सुखों को टालते रहते हैं—परिवार के साथ समय, मित्रों की हँसी, प्रकृति के बीच टहलना, माता-पिता के साथ संवाद और बड़ी उपलब्धियों के पीछे दौड़ते हैं। अंतत: जब रुकते हैं, तब पाते हैं कि जीवन तो उन्हीं छोटे क्षणों में था जिन्हें हमने नजऱअंदाज़ किया। युवा पीढ़ी के लिए यह बड़ा संदेश है कि सफलता के साथ संवेदनाएँ भी जरूरी हैं। केवल करियर बनाना जीवन नहीं, चरित्र बनाना भी जीवन है।
दूसरों के संघर्ष को महसूस करना ही संवेदना है
आपके जीवन का उत्सव किसी दूसरे के लिए परीक्षा भी हो सकता है। जिस बारिश में कोई गीत लिख रहा है, उसी बारिश में कोई छत टपकने से चिंतित है। जिस धूप में कोई पर्यटन का आनंद ले रहा है, उसी धूप में मजदूर पसीना बहा रहा है। इसलिए आध्यात्मिकता केवल ध्यान या पूजा नहीं, संवेदनशीलता भी है। दूसरों के दु:ख को महसूस करना ही आध्यात्मिक जागरण की शुरुआत है। आज समाज में संवेदना का संकट दिखाई देता है। डिजिटल युग में संपर्क बढ़ा है, पर संबंध कमजोर हुए हैं। लोग जुड़े अधिक हैं, जुड़े हुए कम। यदि युवा अपने जीवन में करुणा, सहयोग और सह-अस्तित्व का भाव विकसित करें, तो समाज अधिक मानवीय बन सकता है।
इस संबंध में महात्मा गांधी कहते थे
कि स्वयं को पाने का सर्वोत्तम मार्ग है स्वयं को दूसरों की सेवा में खो देना। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
प्रकृति से सीखें संतुलन
मौसम कभी एक जैसा नहीं रहता। गर्मी है तो वर्षा भी आएगी। शीत है तो वसंत भी लौटेगा। प्रकृति परिवर्तन का प्रतीक है। मनुष्य की पीड़ा तब बढ़ती है जब वह परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाता। वह चाहता है कि सुख स्थायी रहे और दुख कभी न आए। पर जीवन का नियम द्वंद्व है-दिन-रात, सुख-दुख, लाभ-हानि। जो इस द्वंद्व को स्वीकार कर लेता है, वही शांत रह पाता है। यही आध्यात्मिक संतुलन है। आज युवाओं में मानसिक तनाव, अवसाद और अकेलापन बढऩे का एक कारण यह भी है कि वे जीवन को केवल उपलब्धियों के तराजू पर तौलने लगे हैं। जबकि जीवन अनुभवों का समुच्चय है। हार भी शिक्षक है, पीड़ा भी साधना है।
प्रकृति से सीखें संतुलन
मौसम कभी एक जैसा नहीं रहता। गर्मी है तो वर्षा भी आएगी। शीत है तो वसंत भी लौटेगा। प्रकृति परिवर्तन का प्रतीक है। मनुष्य की पीड़ा तब बढ़ती है जब वह परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाता। वह चाहता है कि सुख स्थायी रहे और दुख कभी न आए। पर जीवन का नियम द्वंद्व है-दिन-रात, सुख-दुख, लाभ-हानि। जो इस द्वंद्व को स्वीकार कर लेता है, वही शांत रह पाता है। यही आध्यात्मिक संतुलन है। आज युवाओं में मानसिक तनाव, अवसाद और अकेलापन बढऩे का एक कारण यह भी है कि वे जीवन को केवल उपलब्धियों के तराजू पर तौलने लगे हैं। जबकि जीवन अनुभवों का समुच्चय है। हार भी शिक्षक है, पीड़ा भी साधना है।
किसान का संघर्ष हमें क्या सिखाता है
किसान मौसम से लड़ता नहीं, उसके साथ जीना सीखता है। वह जानता है कि कभी सूखा होगा, कभी अतिवृष्टि। फिर भी वह बीज बोता है। यही आशा है। यही जीवन है। किसान की यही आस्था मनुष्य को सिखाती है कि प्रतिकूलताओं के बीच भी कर्म करते रहना चाहिए। आज युवा छोटी बाधाओं से टूट जाते हैं। उन्हें किसान से सीखना चाहिए-अनिश्चितता के बीच श्रम और विश्वास कैसे जीवित रखा जाता है। यदि समाज किसान के संघर्ष को समझे, तो उसमें विनम्रता आएगी। हम जो अन्न खाते हैं, वह केवल मिट्टी नहीं, पसीने और प्रार्थनाओं से उपजता है।
सुख और दुख दोनों शिक्षक हैं
मनुष्य सामान्यत: सुख को स्वीकार करता है, दुख से बचना चाहता है। परंतु जीवन में दोनों का महत्व है। सुख कृतज्ञता सिखाता है, दुख गहराई। सुख हमें बाहर से समृद्ध करता है, दुख भीतर से। कई बार जिन कठिन अनुभवों को हम अभिशाप मानते हैं, वही आगे चलकर वरदान सिद्ध होते हैं। असफलता दिशा बदल देती है। पीड़ा संवेदना दे देती है। हानि अहंकार तोड़ देती है। कबीर कहते हैं कि दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय। यह केवल भक्ति नहीं, चेतना का विज्ञान है।
युवा पीढ़ी के लिए जीवन संदेश
आज के युवाओं के सामने अवसर भी अधिक हैं, भ्रम भी अधिक। ऐसे समय यह चिंतन उन्हें कुछ मूल संदेश देता है। जीवन एक दौड़ नहीं, यात्रा है। जल्दी सब कुछ पाने की हड़बड़ी तनाव बढ़ाती है। धैर्य सफलता का आधार है। मुश्किलें आपको तोडऩे नहीं, गढऩे आती हैं। उन्हें शिक्षक की तरह स्वीकार करें। जो पल सुंदर है, उसे टालिए मत। संबंधों और संवेदनाओं को समय दीजिए। हर व्यक्ति की यात्रा अलग है। तुलना केवल असंतोष बढ़ाती है। प्रकृति मन को संतुलित करती है। पेड़, वर्षा, मिट्टी, नदी—ये केवल दृश्य नहीं, जीवन के गुरु हैं।
सफलता के साथ संवेदना रखें
सफलता के साथ संवेदना रखें
केवल आगे बढऩा पर्याप्त नहीं, साथ लेकर बढऩा सीखिए। जीवन जीने की कला स्वीकार, आस्था और आनंद जीवन जीने की कला यह नहीं कि दुख न आएं, बल्कि यह कि दुखों के बीच भी मन की शांति बनी रहे। स्वीकार का अर्थ हार मानना नहीं, वास्तविकता को समझकर आगे बढऩा है। आस्था का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, जीवन पर विश्वास रखना है। आनंद का अर्थ केवल सुख नहीं, हर परिस्थिति में अर्थ खोजना है। जब मनुष्य इन तीनों को साध लेता है-स्वीकार, आस्था और आनंद-तब जीवन बोझ नहीं, साधना बन जाता है। आज समाज को भौतिक प्रगति के साथ नैतिक और आध्यात्मिक चेतना की आवश्यकता है। हमें ऐसा समाज बनाना है जहाँ सफलता संवेदना से जुड़ी हो, विकास प्रकृति से जुड़ा हो, और प्रगति मानवता से जुड़ी हो। यदि हम केवल उपभोग की संस्कृति में डूबे रहेंगे, तो भीतर रिक्तता बढ़ती जाएगी। समाज को यह समझना होगा कि मनुष्य की असली सम्पन्नता उसके मूल्यों में है-सत्य, करुणा, श्रम, धैर्य और सहयोग में।
मौसम की तरह बनना सीखें
इस प्रकार हमें मौसम हमें बहुत कुछ सिखाता है—
बादल बनो, बरसना सीखो।
वृक्ष बनो, झुकना सीखो।
नदी बनो, बहना सीखो।
धरती बनो, सहना सीखो।
यदि मनुष्य मौसम की तरह स्वाभाविक और निष्पक्ष हो जाए, तो जीवन सरल हो सकता है। मौसम शिकायत नहीं करता। वह अपना धर्म निभाता है। मनुष्य भी यदि अपना कर्म ईमानदारी से करे और फल को लेकर अत्यधिक व्याकुल न हो, तो जीवन शांत हो सकता है।
आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ
आध्यात्मिकता संसार से भागना नहीं, संसार में रहते हुए सजग होना है। जब बारिश की बूँद में ईश्वर दिखने लगे, किसान के संघर्ष में तपस्या दिखने लगे, दूसरे के दु:ख में अपना दर्द दिखने लगे-वहीं से आध्यात्मिकता शुरू होती है। आज धर्म के बाहरी स्वरूप बहुत हैं, पर भीतर की करुणा कम होती जा रही है। आवश्यकता भीतर के धर्म को जगाने की है। युवा पीढ़ी यदि आध्यात्मिकता को केवल पूजा तक सीमित न रखकर जीवन-मूल्यों से जोड़े, तो समाज में बड़ा परिवर्तन आ सकता है।
जब मौसम पक्षपात नहीं करता, वह अपने स्वभाव के साथ आता है। पर मनुष्य की चेतना उसे अर्थ देती है। यही जीवन का भी सत्य है। परिस्थितियाँ सबके जीवन में आती हैं, पर उनसे हमारा व्यवहार हमारे व्यक्तित्व को गढ़ता है। एक ही बारिश कहीं कविता बनती है, कहीं संघर्ष। एक ही धूप कहीं ऊर्जा देती है, कहीं परीक्षा लेती है। इसलिए जीवन को केवल अपनी दृष्टि से नहीं, व्यापक संवेदना से देखना चाहिए। जो पल खुशी दे, उसे जी भरकर जीना चाहिए, क्योंकि वही पल किसी और के लिए संघर्ष का समय भी हो सकता है। यह बोध हमें विनम्र बनाता है। आज युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह जीवन को प्रतियोगिता नहीं, साधना माने; सफलता को अहंकार नहीं, उत्तरदायित्व माने; और संघर्ष को अभिशाप नहीं, निर्माण माने। अंतत: जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम मौसम की तरह स्वाभाविक, धरती की तरह सहनशील, किसान की तरह आशावान और मनुष्य की तरह संवेदनशील बनें, क्योंकि सच यही है-बूंद-बूंद केवल धरती को नहीं, मन को भी सींचती है। और संघर्ष केवल जीवन को नहीं, व्यक्तित्व को भी गढ़ता है। यही जीवन का संदेश है, यही आध्यात्मिक चिंतन का सार।
मौसम की तरह बनना सीखें
इस प्रकार हमें मौसम हमें बहुत कुछ सिखाता है—
बादल बनो, बरसना सीखो।
वृक्ष बनो, झुकना सीखो।
नदी बनो, बहना सीखो।
धरती बनो, सहना सीखो।
यदि मनुष्य मौसम की तरह स्वाभाविक और निष्पक्ष हो जाए, तो जीवन सरल हो सकता है। मौसम शिकायत नहीं करता। वह अपना धर्म निभाता है। मनुष्य भी यदि अपना कर्म ईमानदारी से करे और फल को लेकर अत्यधिक व्याकुल न हो, तो जीवन शांत हो सकता है।
आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ
आध्यात्मिकता संसार से भागना नहीं, संसार में रहते हुए सजग होना है। जब बारिश की बूँद में ईश्वर दिखने लगे, किसान के संघर्ष में तपस्या दिखने लगे, दूसरे के दु:ख में अपना दर्द दिखने लगे-वहीं से आध्यात्मिकता शुरू होती है। आज धर्म के बाहरी स्वरूप बहुत हैं, पर भीतर की करुणा कम होती जा रही है। आवश्यकता भीतर के धर्म को जगाने की है। युवा पीढ़ी यदि आध्यात्मिकता को केवल पूजा तक सीमित न रखकर जीवन-मूल्यों से जोड़े, तो समाज में बड़ा परिवर्तन आ सकता है।
जब मौसम पक्षपात नहीं करता, वह अपने स्वभाव के साथ आता है। पर मनुष्य की चेतना उसे अर्थ देती है। यही जीवन का भी सत्य है। परिस्थितियाँ सबके जीवन में आती हैं, पर उनसे हमारा व्यवहार हमारे व्यक्तित्व को गढ़ता है। एक ही बारिश कहीं कविता बनती है, कहीं संघर्ष। एक ही धूप कहीं ऊर्जा देती है, कहीं परीक्षा लेती है। इसलिए जीवन को केवल अपनी दृष्टि से नहीं, व्यापक संवेदना से देखना चाहिए। जो पल खुशी दे, उसे जी भरकर जीना चाहिए, क्योंकि वही पल किसी और के लिए संघर्ष का समय भी हो सकता है। यह बोध हमें विनम्र बनाता है। आज युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह जीवन को प्रतियोगिता नहीं, साधना माने; सफलता को अहंकार नहीं, उत्तरदायित्व माने; और संघर्ष को अभिशाप नहीं, निर्माण माने। अंतत: जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम मौसम की तरह स्वाभाविक, धरती की तरह सहनशील, किसान की तरह आशावान और मनुष्य की तरह संवेदनशील बनें, क्योंकि सच यही है-बूंद-बूंद केवल धरती को नहीं, मन को भी सींचती है। और संघर्ष केवल जीवन को नहीं, व्यक्तित्व को भी गढ़ता है। यही जीवन का संदेश है, यही आध्यात्मिक चिंतन का सार।
विश्वाश हलवाई (नयन)
