मध्य प्रदेश

Rewa news;रीवा नगर सेना में ‘भ्रष्टाचार की परेड’: ड्यूटी से लेकर ‘घर बैठे सैलरी’ तक का फिक्स रेट, क्या यही है अनुशासन

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Rewa news: रीवा। अनुशासन और सेवा का पर्याय मानी जाने वाली नगर सेना की वर्दी पर भ्रष्टाचार के दाग लगने शुरू हो गए हैं। रीवा नगर सेना कार्यालय इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर नहीं, बल्कि ड्यूटी पोस्टिंग और “सुविधा शुल्क” के कथित खेल को लेकर चर्चाओं के केंद्र में है।

सूत्रों का दावा है कि यहाँ विभाग के भीतर एक समानांतर ‘रेट कार्ड’ चल रहा है, जहाँ नियम नहीं बल्कि नोटों की चमक तय करती है कि किसकी ड्यूटी कहाँ लगेगी।

‘रेट लिस्ट’ वाली ड्यूटी: थानों से ट्रैफिक तक सब बिकाऊ!
अंदरूनी सूत्रों की मानें तो रीवा के नगर सेना कार्यालय में पोस्टिंग के लिए बोलियां लगती हैं। महिला थाना, आजाद नगर थाना या फिर ट्रैफिक हर जगह की अपनी कीमत है।

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सफेद वर्दी का रसूख: ट्रैफिक ड्यूटी में रहकर वाहन चेकिंग और समझौता राशि वसूलने की “सुविधा” के लिए सैनिकों से कथित तौर पर 3000 से 5000 तक वसूले जा रहे हैं।

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पसंदीदा पोस्टिंग: मनचाहे थाने या मंदिर में ड्यूटी चाहिए बस “बागरी” जी( सूत्रों द्वारा बताया गया नाम) की डिमांड पूरी कीजिए और तैनाती पा लीजिए।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा “घोस्ट ड्यूटी” यानी घर बैठे वेतन लेने का है। आरोप है कि नगर सेना के कई जवान महीनों तक अपनी ड्यूटी पर नहीं जाते, बल्कि अपने गांवों में रहकर खेती या अन्य काम करते हैं। इसके बदले में वे अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा कार्यालय के “कलेक्टरों” को कमीशन के रूप में देते हैं।
सूत्रों का दावा: “500 से लेकर 5000 प्रति माह तक का ‘सेवा कर’ देने पर आप घर पर सो सकते हैं, आपकी हाजिरी रजिस्टर में लग जाएगी।”

‘सेवा कर’ नहीं तो ‘सजा’: ईमानदारी पर भारी पड़ती मनमानी

जो सैनिक इस भ्रष्टाचार के तंत्र का हिस्सा नहीं बनना चाहते या पैसा देने में असमर्थ हैं, उन्हें दंड स्वरूप दूरदराज के इलाकों या असुविधाजनक ड्यूटी पर भेज दिया जाता है। हर महीने एक निश्चित राशि “अनिवार्य टैक्स” के रूप में वसूली जा रही है, जिसे न देने पर सैनिकों का मानसिक उत्पीड़न किया जाता है।

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सरकार की साख पर सवाल: क्या होगी निष्पक्ष जांच

यह मामला केवल एक जिला कार्यालय का नहीं, बल्कि प्रदेश की न्याय व्यवस्था और अनुशासन की जड़ों पर प्रहार है। यदि इन आरोपों की उच्च स्तरीय जांच होती है, तो कई सफेदपोश अधिकारियों के चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।

जनता और पीड़ित सैनिकों के मन में कुछ सुलगते सवाल

क्या उपमुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र के आसपास इस तरह की धांधली पर लगाम लगेगी, क्या विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस ‘रेट लिस्ट’ से अनजान हैं या उनकी भी इसमें मूक सहमति है,
क्या शिकायत करने वाले सैनिकों को सुरक्षा और न्याय मिलेगा, या मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा,

नगर सेना का मूल मंत्र “निष्काम सेवा” है, लेकिन रीवा कार्यालय में यह “सकाम मेवा” में बदलता दिख रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘भ्रष्टाचार की परेड’ को रोकता है या इसे फाइलों के नीचे दबा देता है।

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