Mp police: मप्र पुलिस में पदोन्नति पर लगा ब्रेक 11 साल की सेवा के बाद भी सूबेदार-SI को नहीं मिला ‘कार्यवाहक’ का मान
Mp police: मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में पिछले एक साल से ‘कार्यवाहक पदोन्नति’ की प्रक्रिया पर लगी अघोषित रोक अब एक बड़ा प्रशासनिक सिरदर्द बन गई है। सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक के हजारों जांबाज पुलिसकर्मी प्रमोशन की कतार में खड़े हैं, लेकिन शासन और पुलिस मुख्यालय के बीच तालमेल की कमी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
2015 बैच: योग्यता पूरी, फिर भी ‘इंतजार’ की सजा: Mp police
सबसे ज्यादा मार 2015 बैच के सूबेदार और उप-निरीक्षकों पर पड़ी है। नियमानुसार, यह बैच अपनी 11 साल की अनिवार्य सेवा और सभी विभागीय पात्रताएं पूरी कर चुका है। डेढ़ साल पहले ही इन्हें कार्यवाहक निरीक्षक बनाया जाना था, लेकिन रोक के चलते पूरी प्रक्रिया फाइलों में दफन होकर रह गई है।
मंगलवार को इस बैच के एक प्रतिनिधिमंडल ने डीजीपी कैलाश मकवाना से मिलकर अपनी व्यथा साझा की और जल्द निर्णय लेने की मांग उठाई।
वर्ष 2005 से 2025 तक के पदोन्नति नियमों को लेकर मामला हाईकोर्ट में लंबित है। राजस्व, आबकारी और प्रशासनिक विभागों में कार्यवाहक प्रमोशन जारी हैं, लेकिन पुलिस विभाग में इस पर ‘ब्रेक’ लगा हुआ है।
थानों और रक्षित केंद्रों में निरीक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिससे कानून-व्यवस्था का प्रबंध प्रभावित हो रहा है।
लंबे समय से एक ही पद पर टिके रहने से फील्ड स्टाफ में भारी असंतोष और निराशा है।
जब पद खाली हों, तो वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर निचले पद के कर्मचारी को उच्च पद का ‘अस्थाई प्रभार’ दिया जाता है। यह नियमित प्रमोशन नहीं है, लेकिन इससे फील्ड में अफसरों की कमी दूर होती है और कर्मचारी का मनोबल बढ़ता है।
इन पदों पर अटकी है चेन:
सिपाही से प्रधान आरक्षक
प्रधान आरक्षक से सहायक उपनिरीक्षक
ASI से उपनिरीक्षक
उपनिरीक्षक से निरीक्षक
पुलिस महकमे में नीचे से ऊपर तक की यह पदोन्नति श्रृंखला टूटने से सीधे तौर पर फील्ड की कार्यक्षमता पर असर पड़ रहा है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह कब हाईकोर्ट के पेच को सुलझाकर या कोई बीच का रास्ता निकालकर इन हजारों पुलिसकर्मियों को उनका हक देती है।
