मध्य प्रदेश

रीवा में जिला पंचायत CEO रह चुके अफसर का नया अंदाज, दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े खाट पर सोते दिखे

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मप्र में प्रशासनिक कामकाज का एक नया अंदाज सामने आया है, जहां अधिकारी अब फाइलों और दफ्तरों से निकलकर सीधे गांव की मिट्टी में उतरते नजर आ रहे हैं।

ऐसा ही एक मामला दतिया जिले से सामने आया है, जहां कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े और एएसपी सूरज वर्मा गांव के दौरे के दौरान खाट (खटिया) पर सोते हुए नजर आए। यह तस्वीर जैसे ही सोशल मीडिया पर आई, तेजी से वायरल हो गई और लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।

रीवा से जुड़ा पुराना प्रशासनिक अनुभव फिर चर्चा में

इस पूरे घटनाक्रम को खास इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े का प्रशासनिक सफर पहले रीवा से भी जुड़ा रहा है। रीवा में उन्होंने जिला पंचायत CEO के रूप में कार्य किया था, जहां उनकी पहचान एक सख्त लेकिन जनहित में सक्रिय अधिकारी के रूप में बनी थी। उस दौरान कई योजनाओं की निगरानी और प्रशासनिक सख्ती को लेकर वे चर्चा में रहे थे।

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अब वही अधिकारी जब दतिया जिले में गांव की खाट पर सोते दिखाई देते हैं, तो यह उनकी बदलती कार्यशैली और जमीन से जुड़े प्रशासनिक दृष्टिकोण को दिखाता है।

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 गांव में रात बिताकर समझी ग्रामीण हकीकत

यह पूरा दौरा सिर्फ औपचारिक निरीक्षण नहीं था। कलेक्टर और उनकी टीम ने गांव में रात्रि विश्राम किया और ग्रामीणों के बीच रहकर उनकी समस्याओं को करीब से समझा।

बीकरी गांव में चौपाल लगाई गई, जहां ग्रामीणों से सीधे बातचीत की गई। पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं की स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई।

अधिकारियों ने न केवल लोगों की बात सुनी, बल्कि कई मामलों में मौके पर ही समाधान के निर्देश भी दिए।

खाट पर सोती तस्वीर बनी चर्चा का केंद्र

सुबह के समय लगभग 6 बजे की एक तस्वीर सामने आई, जिसमें कलेक्टर और एएसपी गांव के कुएं के पास खाट पर आराम करते हुए नजर आ रहे हैं।

यह दृश्य ग्रामीण जीवन की वास्तविकता से मेल खाता है, लेकिन जब जिले के शीर्ष अधिकारी इसी माहौल में दिखे तो यह लोगों के लिए आकर्षण का विषय बन गया।

ग्रामीणों ने भी सुबह यह दृश्य देखा और कई लोगों ने इसे अपने मोबाइल कैमरों में कैद कर लिया, जिसके बाद यह तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गई।

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 सीएम के “गांव में रुकने” वाले निर्देशों का असर

यह पूरी पहल मोहन यादव के उस निर्देश का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें अधिकारियों को गांवों में रात्रि विश्राम कर जमीनी स्तर पर योजनाओं का आकलन करने के लिए कहा गया है।

इसका उद्देश्य प्रशासन को जनता के और करीब लाना और योजनाओं की वास्तविक स्थिति को समझना है।

दतिया की यह घटना इस नीति का जमीनी उदाहरण बनकर सामने आई है, जहां अधिकारी सिर्फ दौरा करके नहीं लौटे बल्कि ग्रामीण जीवन में पूरी तरह शामिल हुए।

लोगों में बढ़ा भरोसा और सकारात्मक प्रतिक्रिया

कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े की कार्यशैली पहले भी जनता के बीच चर्चा में रही है। जनसुनवाई में लोगों से सीधे संवाद और त्वरित समाधान की उनकी शैली को सराहा जाता रहा है।

इस बार गांव में खाट पर सोने की तस्वीर ने उनकी छवि को और मजबूत कर दिया है। सोशल मीडिया पर लोग इसे “जमीनी प्रशासन” का उदाहरण बता रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि पहली बार उन्होंने किसी बड़े अधिकारी को अपने बीच इतने सरल और सहज रूप में देखा है।

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प्रशासनिक सिस्टम में बदलता ट्रेंड

यह घटना सिर्फ एक वायरल फोटो नहीं, बल्कि बदलते प्रशासनिक मॉडल का संकेत भी है।

पहले जहां अधिकारी गांवों में कुछ घंटों का दौरा कर लौट जाते थे, वहीं अब वे गांव में रुककर वहां की वास्तविक परिस्थितियों को महसूस कर रहे हैं।

यह बदलाव न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ाता है, बल्कि जनता और अधिकारियों के बीच दूरी भी कम करता है।

रीवा में जिला पंचायत CEO के रूप में अपनी पहचान बना चुके स्वप्निल वानखेड़े आज दतिया में कलेक्टर के रूप में एक अलग ही अंदाज में नजर आ रहे हैं।

गांव की खाट पर उनकी मौजूदगी सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि प्रशासन और जनता के बीच बढ़ते भरोसे का प्रतीक बन गई है।

दतिया की यह घटना आने वाले समय में मध्यप्रदेश के प्रशासनिक मॉडल के लिए एक उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है, जहां अधिकारी सिर्फ शासक नहीं बल्कि जनता के साथी बनते दिख रहे हैं।

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