140 साल पहले रीवा में तबाही का मंजर: El Niño की वजह से पड़ा था भयानक अकाल, हजारों लोगों की गई थी जानें फिर लौटा वह मंजर
El Niño : रीवा का इतिहास केवल राजाओं और रियासतों की कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक आपदाओं और भयानक अकालों की दर्दनाक गवाही भी देता है। करीब 140 साल पहले यानी 19वीं सदी के अंतिम दौर में रीवा और पूरे विंध्य क्षेत्र ने ऐसा समय देखा था, जब आसमान से बारिश गायब हो गई थी और धरती सूखकर दरकने लगी थी। उस समय की परिस्थितियों को आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो उसमें El Niño जैसी जलवायु घटना की अहम भूमिका मानी जाती है। मद्रास में लाखों लोगों की जान गई थी, यह मंजर 140 साल बाद फिर लौट सकता है। अंग्रेजी खबरों के मुताबिक ऐसी स्थित उत्पन्न होने के 61% चांस है।
क्या था उस समय का हाल?
19वीं सदी के अंतिम वर्षों में रीवा रियासत पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी। खेती का मतलब था—बारिश, और बारिश का मतलब था—जीवन। लेकिन जब मानसून ने साथ छोड़ दिया, तो हालात तेजी से बिगड़ने लगे। खेत सूख गए, कुएं और तालाब खाली होने लगे, अनाज का उत्पादन लगभग ठप हो गया, पशुधन मरने लगा
और सबसे खतरनाक भूख और बीमारियों का फैलाव लोगों के पास न तो खाने को अनाज बचा था और न ही आजीविका का कोई साधन।
El Niño क्या था और इसका असर कैसे पड़ा?
आज के वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि उस दौर में प्रशांत महासागर में El Niño की स्थिति बनी थी। इस प्राकृतिक घटना में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है, जिससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है।
भारत पर इसका सबसे बड़ा असर मानसून पर पड़ता है।
मानसून कमजोर हो जाता है
बारिश कम या अनियमित हो जाती है
सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है
रीवा और आसपास के क्षेत्रों में भी यही हुआ। बारिश लगभग नहीं के बराबर हुई, और खेती पूरी तरह चौपट हो गई।
यही कारण है कि कई इतिहासकार मानते हैं कि उस दौर के अकाल में El Niño एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक कारण था।
लोगों की जिंदगी कैसे बर्बाद हुई?
जब फसलें नष्ट हो गईं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह टूट गई। रीवा के गांवों में हालात इतने खराब हो गए कि—
लोग जंगलों से पत्ते और जंगली भोजन खाने को मजबूर हुए
कई परिवारों ने पलायन शुरू कर दिया
काम की तलाश में लोग दूर-दूर तक जाने लगे
बीमारियां (हैजा, मलेरिया, दस्त) तेजी से फैलने लगीं
भूख और बीमारी ने मिलकर एक ऐसी स्थिति बना दी, जिसे संभालना लगभग असंभव हो गया था।
मौतों की संख्या कितनी थी?
सबसे कठिन सवाल यही है कि उस समय कितने लोगों की जान गई थी।
इतिहास के रिकॉर्ड बताते हैं कि 1876–78 और 1899–1900 जैसे बड़े अकालों में पूरे भारत में लाखों लोगों की मृत्यु हुई थी। लेकिन रीवा रियासत और विंध्य क्षेत्र के लिए अलग से सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
फिर भी अनुमान लगाया जाता है कि
स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों की मौत भूख और महामारी से हुई
कई गांव पूरी तरह खाली हो गए
जनसंख्या पर गहरा असर पड़ा
उस समय जनगणना और रिकॉर्डिंग सिस्टम इतना मजबूत नहीं था, इसलिए वास्तविक संख्या शायद कभी पूरी तरह सामने नहीं आ पाएगी।
ब्रिटिश प्रशासन और राहत व्यवस्था
उस समय रीवा एक रियासत थी, लेकिन ब्रिटिश प्रभाव भी मौजूद था। राहत कार्य बहुत सीमित और कमजोर थे।
कुछ जगहों पर “रिलीफ वर्क” शुरू किया गया
लेकिन संसाधन बेहद कम थे
अनाज वितरण और राहत पहुंचाने की व्यवस्था धीमी थी
इस वजह से आम जनता को बहुत देर से मदद मिल पाती थी।
क्यों बार-बार पड़ते थे ऐसे अकाल?
रीवा और विंध्य क्षेत्र में अकाल बार-बार आने के पीछे कई कारण थे:
पूरी तरह वर्षा आधारित खेती
सिंचाई साधनों की कमी
जंगल और पहाड़ी इलाकों में सीमित कृषि भूमि
अनाज भंडारण की खराब व्यवस्था
और उस समय की कमजोर प्रशासनिक प्रणाली
जब इन सभी कारणों के साथ El Niño जैसी प्राकृतिक घटना जुड़ती थी, तो स्थिति और भी भयावह हो जाती थी।
आज और उस समय में फर्क
आज अगर उसी तरह की जलवायु स्थिति बनती है, तो तस्वीर पूरी तरह अलग होती है।
मौसम की पहले से चेतावनी मिल जाती है
सिंचाई के आधुनिक साधन मौजूद हैं
अनाज भंडारण और सप्लाई सिस्टम मजबूत है
सरकारी राहत तेजी से पहुंचाई जाती है
लेकिन 140 साल पहले रीवा के लोगों के पास ये कोई सुविधा नहीं थी। वे पूरी तरह प्रकृति के भरोसे थे।
रीवा के इतिहास का वह दौर सिर्फ एक अकाल नहीं था, बल्कि एक ऐसा समय था जब मौसम ने धोखा दिया
El Niño जैसी वैश्विक जलवायु घटना ने मानसून को कमजोर किया। और इंसानी व्यवस्था उस संकट को संभाल नहीं पाई नतीजा यह हुआ कि हजारों जिंदगियां भूख, प्यास और बीमारी के कारण खत्म हो गईं। यह इतिहास आज भी हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के बदलाव कितने बड़े स्तर पर इंसानी जीवन को प्रभावित कर सकते हैं, और समय रहते तैयारी कितनी जरूरी है।
