Indian histri: इतिहास मनुष्य और समाज की स्मृतियों का संकलन भर नहीं है। इतिहास वह आईना है, जिसमें सभ्यताएं अपने उत्थान और पतन, अपने आदर्श और विचलन, अपनी उपलब्धियां और अपनी भूलें देख सकती हैं। इतिहास के पन्नों में जहां त्याग, तपस्या, संघर्ष, न्याय और मानवीय मूल्यों की गौरवगाथाएं दर्ज हैं, वहीं अधर्म, अन्याय, अत्याचार, शोषण, पक्षपात, सत्ता के दुरुपयोग और अनैतिक आचरण के अनेक प्रसंग भी मिलते हैं। इन दोनों पक्षों का अध्ययन इसलिए आवश्यक है कि वर्तमान पीढ़ी अतीत के अनुभवों से सीख सके और भविष्य को अधिक न्यायपूर्ण बना सके।
लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब इतिहास के किसी कालखंड में हुए अन्याय को आज के अन्याय के औचित्य के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगे। क्या किसी समय कोई गलत कार्य हुआ था, इसलिए आज भी वैसा ही गलत कार्य स्वीकार्य हो जाना चाहिए? क्या अतीत में भ्रष्ट आचरण करने वाले लोग मौजूद थे, इसलिए वर्तमान में भ्रष्टाचार को लेकर हमारी संवेदनशीलता समाप्त हो जाए, क्या किसी पुराने अत्याचार का उल्लेख वर्तमान के अत्याचार को सही ठहराने के लिए किया जा सकता है-निश्चित रूप से नहीं।
अतीत में गलत हुआ था तो वह गलत ही था वर्तमान में गलत हो रहा है तो वह भी गलत ही रहेगा। समय बदलने से नैतिकता के मूल प्रश्न नहीं बदलते। परिस्थितियां बदल सकती हैं, व्यवस्थाएं बदल सकती हैं, संस्थाएं बदल सकती हैं, लेकिन न्याय और अन्याय के बीच का मूल अंतर समाप्त नहीं हो सकता।
इतिहास से सीखना है, इतिहास को ढाल नहीं बनाना
किसी भी सभ्य समाज की परिपक्वता इस बात से निर्धारित होती है कि वह अपने अतीत की गलतियों को किस दृष्टि से देखता है। परिपक्व समाज अपनी भूलों को छिपाता नहीं, उनसे सीखता है। वह यह नहीं कहता कि चूंकि पहले भी अन्याय हुआ था, इसलिए आज का अन्याय स्वीकार कर लिया जाए। बल्कि वह कहता है कि पिछली पीढिय़ों की भूलों को दोहराया नहीं जाना चाहिए। इतिहास का सबसे बड़ा उपयोग यही है कि वह हमें चेताता है। सत्ता जब निरंकुश हुई तो उसके परिणाम क्या रहे, सामाजिक विभाजन ने समाज को कहां पहुंचाया, पक्षपात ने संस्थाओं की विश्वसनीयता को कैसे प्रभावित किया, अनैतिक तरीके से अर्जित संपत्ति ने सामाजिक असमानता को किस प्रकार बढ़ाया, इन सबका अध्ययन वर्तमान को सावधान करने के लिए होना चाहिए। इतिहास को यदि हम वर्तमान के दोषों का बचाव करने का औजार बना देंगे, तो इतिहास से सीखने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
राजधर्म केवल शासन नहीं, न्यायपूर्ण व्यवस्था है
हर युग का अपना राजधर्म होता है। राजधर्म का अर्थ केवल शासन करना, कानून बनाना अथवा प्रशासन चलाना नहीं है। राजधर्म का मूल उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, न्याय की स्थापना, समान अवसर और सार्वजनिक संस्थाओं में विश्वास कायम करना है। व्यवस्था में बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा इसलिए की जाती है कि वह व्यक्तिगत हित से ऊपर सार्वजनिक हित को रखे। निर्णय में पक्षपात न हो, अधिकार का उपयोग उत्तरदायित्व के साथ हो और सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग पारदर्शिता के साथ किया जाए, यही राजधर्म की आत्मा है। इसी प्रकार आचार्य धर्म का अर्थ केवल ज्ञान देना नहीं है। शिक्षक, मार्गदर्शक और बौद्धिक वर्ग समाज की चेतना का निर्माण करते हैं। यदि ज्ञान के साथ विवेक और नैतिकता नहीं होगी तो शिक्षा भी केवल सूचना का संग्रह बनकर रह जाएगी। समाज धर्म हमें परस्पर सम्मान, सहयोग, संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व की शिक्षा देता है, जबकि स्वधर्म हमें अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहने की प्रेरणा देता है। जब राजधर्म, आचार्य धर्म, समाज धर्म और स्वधर्म अपने मूल स्वरूप में सक्रिय होते हैं, तभी स्वस्थ व्यवस्था का निर्माण होता है।
अनैतिक संपत्ति कभी उपलब्धि नहीं हो सकती
आज के समय में सफलता को अक्सर संपत्ति, पद और प्रभाव के पैमाने पर मापा जाने लगा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आर्थिक समृद्धि जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने और समाज के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन प्रश्न यह है कि संपत्ति अर्जित करने का मार्ग क्या है। मेहनत, प्रतिभा, उद्यम और वैध साधनों से अर्जित संपत्ति सम्मान का विषय हो सकती है। लेकिन छल, भ्रष्टाचार, शोषण, पक्षपात, पद के दुरुपयोग या किसी अन्य अनैतिक माध्यम से अर्जित संपत्ति को केवल इसलिए सम्मानजनक नहीं बनाया जा सकता कि वह बड़ी मात्रा में अर्जित हुई है। यहां समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि समाज परिणाम देखकर प्रभावित होगा और साधन की शुचिता की उपेक्षा करेगा, तो धीरे-धीरे अनैतिक आचरण को सामाजिक स्वीकृति मिलने लगेगी। इसलिए हमें सफलता के साथ उसके साधन को भी देखना होगा।
असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, शक्ति है
किसी भी जीवंत समाज में सभी लोगों का एक जैसा सोचना संभव नहीं है। विचारों में भिन्नता होगी, नीतियों पर मतभेद होंगे और व्यवस्था के निर्णयों पर प्रश्न भी उठेंगे। यही स्वस्थ सामाजिक विमर्श का आधार है। अभिव्यक्ति और असहमति की स्वायत्तता का सम्मान करना हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति का आवश्यक हिस्सा है। असहमति को शत्रुता मान लेना और प्रश्न उठाने वाले व्यक्ति को विरोधी समझ लेना सामाजिक संवाद को कमजोर करता है। हमें यह सीखना होगा कि किसी व्यक्ति से असहमत होना और उसका अपमान करना दो अलग बातें हैं। किसी विचार का विरोध करना और विचार रखने वाले व्यक्ति से घृणा करना भी दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक समाज में तर्क का उत्तर तर्क से दिया जाना चाहिए, असहमति का उत्तर असहमति से दिया जा सकता है, लेकिन नफरत से नहीं।
विमर्श हो, वैमनस्य नहीं
आज सूचना का प्रवाह अत्यंत तीव्र है। कोई भी घटना कुछ ही समय में व्यापक चर्चा का विषय बन सकती है। ऐसी स्थिति में जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। अधूरी जानकारी, संदर्भविहीन इतिहास, अफवाह और उत्तेजक भाषा समाज में अनावश्यक तनाव पैदा कर सकती है। इतिहास के कठिन प्रसंगों पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन तथ्य और संदर्भ के साथ। सामाजिक प्रश्नों पर बहस होनी चाहिए, लेकिन संयम के साथ। व्यवस्था की आलोचना होनी चाहिए, लेकिन सुधार की भावना से। यही विमर्श की संस्कृति है। यदि किसी बहस का परिणाम समाज को समझदार बनाने के बजाय समाज में घृणा, नफरत, बैमनस्य और टकराव बढ़ाना है, तो हमें अपनी भाषा और दृष्टिकोण दोनों पर आत्ममंथन करना चाहिए।
परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से
हम अक्सर व्यवस्था को बदलने की बात करते हैं। सरकार से पारदर्शिता की अपेक्षा करते हैं, प्रशासन से ईमानदारी चाहते हैं, संस्थाओं से जवाबदेही मांगते हैं और समाज में नैतिकता की कमी पर चिंता व्यक्त करते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक प्रश्न अक्सर छूट जाता है—क्या हम स्वयं अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। भ्रष्टाचार केवल लेने वाले से समाप्त नहीं होगा, देने वाला भी अपने व्यवहार पर विचार करे। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा केवल प्रशासन का दायित्व नहीं, नागरिक का भी कर्तव्य है। कानून का सम्मान केवल पुलिस या न्यायपालिका से अपेक्षित नहीं, नागरिक जीवन की भी बुनियादी शर्त है। समाज में स्वच्छता केवल नगर निकाय की जिम्मेदारी नहीं, प्रत्येक नागरिक के व्यवहार से जुड़ा विषय है। बड़ा परिवर्तन हमेशा बड़े घोषणापत्रों से नहीं आता। कभी-कभी वह छोटे-छोटे व्यक्तिगत निर्णयों से शुरू होता है, गलत लाभ लेने से इनकार, अनुचित कार्य में सहयोग न करना, तथ्यहीन बात आगे न बढ़ाना, किसी कमजोर व्यक्ति के अधिकार के लिए आवाज उठाना और अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाना।
हमें तय करना है कि इतिहास से क्या लेना है
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम अतीत में हुए हर अन्याय को वर्तमान की हर समस्या का उत्तर बना दें। आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास से विवेक ग्रहण करें। इतिहास हमें बताता है कि अन्याय अंतत: समाज में असंतोष पैदा करता है। सत्ता का दुरुपयोग संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। पक्षपात सामाजिक विश्वास को चोट पहुंचाता है। अनैतिक आचरण व्यवस्था की जड़ों को कमजोर करता है। इसलिए इतिहास की चेतावनियों को समझना और उनसे वर्तमान को सुधारना ही उसके अध्ययन की सार्थकता है। हमें अतीत को नकारना नहीं है, लेकिन अतीत में अटकना भी नहीं है। हमें इतिहास को भूलना नहीं है, लेकिन इतिहास के नाम पर वर्तमान में नफरत भी नहीं बोनी है। हमें गलतियों को छिपाना नहीं है, लेकिन उन्हें दोहराने का बहाना भी नहीं बनाना है। अंतत: किसी भी समाज की वास्तविक पहचान उसकी संपत्ति, सत्ता या बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसकी न्यायप्रियता, नैतिकता, संवेदनशीलता और सार्वजनिक जीवन की सुचिता से होती है। इसलिए आज का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि अतीत में किसने क्या गलत किया था, बल्कि यह है कि आज हमारे सामने जो गलत है, उसे ठीक करने के लिए हम क्या कर रहे हैं।
यही वर्तमान का युगधर्म है। यही राजधर्म की अपेक्षा है। यही समाजधर्म का सार है और यही प्रत्येक नागरिक का स्वधर्म भी। आइए, इतिहास को बहस का हथियार नहीं, आत्ममंथन का आईना बनाएं। असहमति को शत्रुता नहीं, संवाद का अवसर मानें। अधिकार के साथ कर्तव्य को स्वीकार करें और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर सार्वजनिक हित को स्थान दें। हममें से प्रत्येक यदि अपने आचरण में थोड़ी-सी अधिक ईमानदारी, थोड़ी सी अधिक संवेदनशीलता और थोड़ी सी अधिक जिम्मेदारी जोड़ सके तो व्यवस्था बदलने की शुरुआत वहीं से हो सकती है। बेहतर समाज किसी एक व्यक्ति के आने की प्रतीक्षा से नहीं बनता वह तब बनता है, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को उस परिवर्तन का सहभागी मानता है।
हरित प्रवाह के साथ अपडेट रहें
अमर मिश्रा ‘हरित प्रवाह’ समाचार पत्र के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें डिजिटल मीडिया और समाचार संपादन का लंबा अनुभव है।
