रीवा संभाग

“रीवा का ‘झाड़ूवाला’ बना मिसाल: नौकरी छूटने के बाद बांस की झाड़ू से बदली किस्मत, संघर्ष की कहानी हो रही वायरल”

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रीवा शहर की सुबह जब अपनी रफ्तार पकड़ती है, सड़कों पर झाड़ू लगती है और गलियां साफ-सुथरी नजर आती हैं, तब शायद ही कोई इस बात पर ध्यान देता हो कि इन चमकती सड़कों के पीछे किसी के संघर्ष की लंबी कहानी छुपी है। यह कहानी है शंकर बंसल की—एक ऐसे इंसान की, जिसने जिंदगी के सबसे कठिन दौर में हार मानने के बजाय अपने हुनर को ही अपनी ताकत बना लिया।

शंकर बंसल, रीवा के गुढ़ चौराहे के पास स्थित बंसल बस्ती के रहने वाले हैं। एक साधारण परिवार में जन्मे शंकर की जिंदगी भी आम लोगों की तरह ही चल रही थी। वह पुरातत्व विभाग में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते थे। हर महीने मिलने वाली सैलरी से परिवार का गुजारा हो जाता था। उनके परिवार में माता-पिता, पत्नी और बच्चे मिलाकर कुल सात सदस्य हैं। जिम्मेदारियां बड़ी थीं, लेकिन जिंदगी पटरी पर थी।

लेकिन कहते हैं ना, जिंदगी कब किस मोड़ पर ले आए, कोई नहीं जानता। एक दिन अचानक उनकी नौकरी चली गई। बिना किसी तैयारी के आए इस संकट ने उनके सामने कई सवाल खड़े कर दिए। घर का खर्च कैसे चलेगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी? माता-पिता की देखभाल कैसे होगी? इन सवालों ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।

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कुछ दिनों तक शंकर भी इस सदमे से जूझते रहे। लेकिन उन्होंने हालात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने ठान लिया कि वह हार नहीं मानेंगे। तभी उन्हें अपने पुस्तैनी काम की याद आई—बांस की झाड़ू बनाना। यह काम उनके परिवार में पीढ़ियों से होता आ रहा था, लेकिन आधुनिक समय में यह कला धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी।

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शंकर ने उसी पुराने हुनर को फिर से अपनाने का फैसला किया। शुरुआत आसान नहीं थी। एक तरफ आर्थिक तंगी थी, दूसरी तरफ बाजार में अपनी पहचान बनानी थी। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बांस खरीदना शुरू किया और अपने हाथों से झाड़ू बनाना शुरू कर दिया।

बांस से झाड़ू बनाना एक बेहद मेहनत और धैर्य का काम है। शंकर बताते हैं कि एक बांस से करीब 5 छोटी और 3 बड़ी झाड़ू तैयार होती हैं। एक बांस की कीमत 200 से 300 रुपये तक होती है। इसके बाद बांस को काटना, उसे पतली-पतली लकड़ियों में बदलना, फिर उन्हें छीलकर बराबर करना और अंत में झाड़ू का आकार देना—यह पूरी प्रक्रिया काफी जटिल होती है।

इस काम के दौरान कई बार उनके हाथों में बांस की नुकीली फांस चुभ जाती है। हथेलियां छिल जाती हैं, खून तक निकल आता है। लेकिन शंकर के हौसले के आगे यह दर्द भी छोटा पड़ जाता है। वे कहते हैं, “दर्द तो होता है, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी उससे बड़ी है।”

धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। उनके द्वारा बनाई गई झाड़ू की गुणवत्ता ने लोगों का ध्यान खींचा। उनकी झाड़ू मजबूत होती है, जल्दी खराब नहीं होती और सफाई के लिए बेहद प्रभावी होती है। यही वजह है कि अब रीवा शहर में उनकी बनाई झाड़ू की काफी मांग है।

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आज हालात यह हैं कि रीवा नगर निगम, कोर्ट, कमिश्नर ऑफिस और कई अन्य सरकारी संस्थानों में उनकी बनाई हुई झाड़ू का इस्तेमाल हो रहा है। सड़कों की सफाई से लेकर दफ्तरों तक, हर जगह शंकर के हाथों की मेहनत दिखाई देती है।

शंकर बताते हैं कि अब वे हर महीने 15 से 20 हजार रुपये तक कमा लेते हैं। यह कमाई भले ही बहुत ज्यादा न हो, लेकिन इसमें आत्मसम्मान और संतोष है। यह कमाई उन्हें यह एहसास दिलाती है कि उन्होंने अपने दम पर अपने परिवार को संभाला है।

हालांकि, इस सफर में उन्हें कुछ कड़वे अनुभव भी हुए हैं। शंकर बताते हैं कि आज भी समाज में कुछ लोग ऐसे हैं, जो छुआछूत की मानसिकता के कारण उनकी बनाई झाड़ू खरीदने से बचते हैं। यह बात उन्हें दुख जरूर देती है, लेकिन वे इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने देते।

वे कहते हैं, “काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत और ईमानदारी ही इंसान को बड़ा बनाती है।” शंकर का यह नजरिया ही उन्हें दूसरों से अलग बनाता है।

उनकी कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की भी कहानी है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इंसान के पास हुनर है और वह मेहनत करने को तैयार है, तो वह किसी भी परिस्थिति में खुद को संभाल सकता है।

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आज शंकर का एक सपना भी है। वे चाहते हैं कि उनका यह काम और बड़े स्तर पर पहुंचे। अगर उन्हें सरकार से थोड़ी आर्थिक मदद मिल जाए, तो वे एक छोटा उद्योग शुरू कर सकते हैं। इससे न सिर्फ उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि वे और लोगों को भी रोजगार दे पाएंगे।

वे चाहते हैं कि उनके जैसे और लोग, जो बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, वे भी अपने पुस्तैनी काम या हुनर को अपनाकर आत्मनिर्भर बनें। उनका मानना है कि अगर सही दिशा और थोड़ा सहयोग मिल जाए, तो कोई भी इंसान अपनी जिंदगी बदल सकता है।

रीवा की सड़कों पर चलती हर झाड़ू, सिर्फ सफाई का काम नहीं करती, बल्कि वह शंकर बंसल के संघर्ष, मेहनत और जज्बे की कहानी भी बयां करती है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जिंदगी में मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इंसान हार न माने, तो वह हर हाल में जीत सकता है।

शंकर बंसल आज सिर्फ एक कारीगर नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुके हैं—उन सभी लोगों के लिए, जो मुश्किल हालात में खुद को कमजोर समझ बैठते हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि जब हौसले बुलंद हों, तो कोई भी राह मुश्किल नहीं होती, और मेहनत से लिखी गई किस्मत कभी धोखा नहीं देती।

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