Rewa News: रीवा जिला दुनिया भर में काफी प्रसिद्ध है उसकी सबसे अहम वजह है रीवा की पहचान सफेद बाघ (Whit Tigher) विश्व में सबसे पहले रीवा रियासत में ही यह अनमोल दुर्लभ सफेद बाघ मिला था। आज दुनिया में जितने भी सफेद बाघ हैं वह सभी रीवा में मिले सफेद बाघों की वंशज है। रीवा इसी नाम से लोकप्रिय है।

मिली जानकारी के अनुसार 31 अक्टूबर 2024 को देश में दिवाली है इसी त्यौहार को देखते हुए रीवा प्रशाशन ने रीवा स्थित मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी को बंद करने का निर्णय लिया है। लेकिन आपको बता दें कि 31 अक्टूबर की सुबह 1 नवंबर को सुबह 9:30 बजे से इसे फिर से शुरू कर दिया जाएगा आप आनंद ले सकेंगे।

दुनिया के पहले सफेद बाघ की कहानी की शुरुआत 1951 से मानी जाती है जहां पर सीधी (Sidhi) जिले के बरगढ़ी के पंखोरा के जंगल में पकड़ा गया था। रीवा में उस दौरान के महाराजा मार्तंड सिंह जोधपुर के राजा अजीत सिंह के साथ सीधी जिले के बरगढ़ी के पंखोरा जंगल में शिकार खेलने गए थे इसी दौरान एक गुफा के पास एक बाघिन अपने तीन शावकों के साथ नजर आई।

महाराजा ने बाघिन और उसके दो शावको को मार दिया लेकिन राजा के शिकार के हाथों तीसरा शावक छूट गया और वो पास में ही एक गुफा में छिप गया, वह देखने में बिल्कुल अद्भुत था इस वजह से महाराज से उसे अपने साथ ले जाने का फैसला किया और गोविंदगढ़ के किले में लाया जिसका नाम 'मोहन' दिया गया।बताया जाता हैं कि, राजा मार्तंड सिंह और मोहन का संबंध प्रगाढ़ था।

जहां पर महाराज अपना काफी समय गोविंदगढ़ के किले में मोहन को देते थे। उसके साथ फुटबॉल खेलते थे. ऊंचाई पर महाराज होते थे, बाड़े में मोहन, इतना ही नहीं कहा जाता हैं कि , मोहन को लोग नाम से नहीं बुलाते थे बल्कि जी कहकर सम्मान देते थे,बाघ मोहन की खासियत थी, कि रविवार के दिन मांस नहीं खाता था। रविवार के दिन केवल दूध दिया जाता था।