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पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: 27 लाख वोटरों के नाम कटने पर मचा सियासी घमासान, चुनाव आयोग के ‘दो टूक’ जवाब से विवाद गहराया

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पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में हुए बड़े बदलावों ने एक नए संवैधानिक विवाद को जन्म दे दिया है। चुनाव आयोग (ECI) द्वारा राज्य में ‘गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के बाद करीब 27 लाख मतदाताओं के नाम काटे जाने पर विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और आंकड़ों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया कुछ खास क्षेत्रों में अधिक सक्रिय रही है।

मुस्लिम और SC बहुल क्षेत्र:मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और मालदा जैसे जिलों में नाम कटने की दर सबसे अधिक है। अकेले मुर्शिदाबाद में 4.55 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं।
*म5% वोटरों का प्रभाव: विशेषज्ञों का मानना है कि ये 27 लाख वोटर बंगाल की कुल मतदाता संख्या का लगभग 5% हैं। 2021 के चुनावों में कई सीटों पर जीत का अंतर इससे कम था, ऐसे में यह बदलाव चुनावी नतीजों को पूरी तरह प्रभावित कर सकता है।

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चुनाव आयोग का ‘असामान्य’ रुख और ‘दो टूक’ ट्वीट

आमतौर पर चुनाव आयोग अपनी तटस्थता के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार आयोग के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने विवाद खड़ा कर दिया है। आयोग ने अपने ट्वीट में किसी राजनीतिक दल को ‘दो टूक’ जवाब देने जैसी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे विपक्षी नेताओं ने “अलोकतांत्रिक” और “मर्यादा के खिलाफ” बताया है।

 

TMC सांसदों ने आरोप लगाया है कि जब वे इस मुद्दे पर आयोग से मिलने पहुंचे, तो उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। सांसद साकेत गोखले और महुआ मोइत्रा ने सार्वजनिक रूप से आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 142 का हस्तक्षेप

मामला गंभीर होने पर सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी की है। कोर्ट ने बंगाल में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 142 की अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग किया ताकि मतदाता सूची की विसंगतियों का निपटारा हो सके। हालांकि, नागरिक समाज और योगेंद्र यादव जैसे कार्यकर्ताओं का तर्क है कि 7 अप्रैल को अंतिम सूची जारी होने के बाद वोटरों के पास अपील करने का समय ही नहीं बचा है।

सुरक्षा का घेरा या भय का माहौल?

 

चुनाव को ‘हिंसा मुक्त’ बनाने के लिए बंगाल में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 2400 से अधिक कंपनियां तैनात की गई हैं। यह भारत के चुनावी इतिहास में किसी भी राज्य में की गई सबसे बड़ी तैनाती में से एक है। विपक्ष का सवाल है कि क्या यह सुरक्षा के लिए है या मतदाताओं के बीच मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए?

अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े विपक्षी नेताओं ने इस घटनाक्रम को “लोकतंत्र पर हमला” करार दिया है। वहीं, राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट कहा है कि वे उन सभी 27 लाख लोगों के वोट देने के अधिकार के लिए लड़ेंगी जिनका नाम काटा गया है।
अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई अंतिम समय का हस्तक्षेप (Last-minute intervention) करेगा या 27 लाख नागरिक इस बार लोकतंत्र के महापर्व से बाहर रह जाएंगे।

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