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Trump’s: ट्रंप की परमाणु धमकी और ईरान की ‘मानव ढाल’: क्या महाविनाश की ओर बढ़ रही है दुनिया

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Trump’s: पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है जहाँ दुनिया पर परमाणु युद्ध का साया मंडराने लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को “एक रात में तबाह” करने की ताजा धमकी ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है। ट्रंप की इस ‘डेडलाइन’ का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा है, पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं।

ट्रंप की चेतावनी: “एक रात में खत्म हो जाएगा देश”

अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि वे ईरान के पावर प्लांट, पुलों और प्रमुख बुनियादी ढांचों को निशाना बनाएंगे। ट्रंप की इस आक्रामकता को देखते हुए अमेरिका के भीतर ही विरोध के स्वर उठने लगे हैं। वरिष्ठ पत्रकार टकर कार्लसन ने अपनी अपील में कहा है कि यदि राष्ट्रपति परमाणु हमले का आदेश देते हैं, तो सेना को इसे मानने से इनकार कर देना चाहिए। वहीं, ट्रंप का कहना है कि वे ईरान को ‘स्टोन एज’  में पहुँचाने की क्षमता रखते हैं।

 

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 ईरान का ‘ह्यूमन शील्ड’ दांव

ट्रंप की मिसाइलों और बमों के जवाब में ईरान ने एक अनोखा ‘नागरिक प्रतिरोध’ शुरू किया है। ईरान सरकार ने अपने नागरिकों से उन बिजली घरों और सिविलियन इमारतों के बाहर ‘मानव श्रृंखला’ बनाने की अपील की है जिन्हें अमेरिका निशाना बना सकता है। ईरान का तर्क है कि नागरिकों की मौजूदगी में हमला करना एक ‘युद्ध अपराध’ होगा। यहाँ तक कि ईरानी कलाकार और संगीतकार भी इन पावर प्लांटों के बाहर शांति की धुनें बजाकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट

इस युद्ध की आग अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़नी शुरू कर दी है ।
रिफाइनरियों को निशाना बनाने की धमकी दी है। चूंकि दुनिया की हर छोटी-बड़ी चीज (दवा, प्लास्टिक, टायर) में पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल होता है, इसलिए इसकी कमी से महंगाई चरम पर पहुँच सकती है।

2030′ खतरे में है और उसे अब तक लगभग 500 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है। पड़ोसी देशों में हाहाकार: ईंधन की कमी के कारण नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में बिजली कटौती और दफ्तरों के समय में बदलाव जैसे कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और ‘ग्लोबल लीडर्स’ की भूमिका पर उठ रहा है। G20, ब्रिक्स और क्वाड जैसे ताकतवर समूहों की शांति बहाली में कोई सक्रिय भूमिका नजर नहीं आ रही है। युद्ध के 38वें दिन भी कोई ठोस समझौता नहीं हो सका है, जिससे यह साफ है कि कूटनीतिक रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं।
अब दुनिया की नजरें बुधवार सुबह की उस डेडलाइन पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि इंसानियत शांति की ओर बढ़ेगी या विनाशकारी परमाणु युद्ध की ओर।

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